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    28 साल पुराने रेल हादसे पर फैसला, पोती की मौत पर दादा को मिलेगा मुआवजा; हाई कोर्ट ने खारिज की केंद्र की अपील

    Updated: Thu, 04 Jun 2026 07:15 AM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने खन्ना रेल हादसे में पोती की मौत पर दादा को दिए गए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि निर्भरता के ...और पढ़ें

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    HighLights

    1. खन्ना रेल हादसे में दादा को मुआवजा बरकरार।

    2. निर्भरता में आर्थिक के साथ भावनात्मक सहारा भी।

    3. हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील खारिज की।

    दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। देश के सबसे भीषण रेल हादसों में शामिल वर्ष 1998 के खन्ना रेल दुर्घटना मामले में लगभग 28 वर्ष बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पोती की मौत पर उसके दादा को दिए गए 4 लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की निर्भरता केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होती, बल्कि परिवार के भीतर मिलने वाले प्रेम, स्नेह, देखभाल और संरक्षण को भी निर्भरता का महत्वपूर्ण आधार माना जाएगा।

    जस्टिस पंकज जैन ने यह फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि दादा अपनी पोती पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, इसलिए उन्हें मुआवजे का दावा करने का अधिकार नहीं है। मामले की शुरुआत 26 नवंबर 1998 को हुए खन्ना रेल हादसे से हुई थी। इस दुर्घटना में दावेदार की पोती समेत परिवार के कई सदस्य मारे गए थे।

    हादसा खन्ना-लुधियाना रेलखंड पर तड़के उस समय हुआ था, जब कोलकाता जा रही सियालदह एक्सप्रेस अपने मार्ग पर पहले से पटरी से उतरे अमृतसर जाने वाली ट्रेन के छह डिब्बों से टकरा गई थी। उस समय दोनों ट्रेनों में करीब 2500 यात्री सवार बताए गए थे। दुर्घटना में कम से कम 212 लोगों की मौत हुई थी और इसे भारत के सबसे भयावह रेल हादसों में गिना जाता है।

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    ट्रिब्यूनल ने दादा के पक्ष में दिया था फैसला

    पोती की मृत्यु के बाद रेलवे दावा अधिकरण (रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल) ने दादा के पक्ष में चार लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे के महाप्रबंधक ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। उनका तर्क था कि रेलवे अधिनियम के तहत केवल वही व्यक्ति मुआवजे का दावा कर सकता है जो मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर हो।

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    हालांकि जस्टिस जैन ने पूर्व में दिए गए एक खंडपीठ के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि निर्भरता की अवधारणा को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध, स्नेह, देखभाल और संरक्षण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

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    दादा-पौती के बीच भावनात्मक रिश्ता

    अदालत ने कहा कि दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच विशेष भावनात्मक रिश्ता होता है। ऐसे में केवल इस आधार पर कि दादा आर्थिक रूप से पोती पर निर्भर नहीं थे, उन्हें मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी नोट किया कि दावेदार का कोई अन्य पोता या पोती नहीं था।

    अपने आदेश में जस्टिस जैन ने कहा कि दादा-दादी की अपने पोते या पोती पर प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारे के लिए निर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए रेलवे दावा अधिकरण द्वारा दिया गया मुआवजा पूरी तरह उचित है।

    मामले में केंद्र सरकार की अपील में कोई दम न पाते हुए हाई कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया और ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा।

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