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    होशियारपुर के ठेकेदार आत्महत्या का मामला, दोषी अधिकारी की बर्खास्तगी बरकरार; हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 07:15 AM (IST)

    हाई कोर्ट ने होशियारपुर के एक नगर पंचायत अधिकारी की सेवा से बर्खास्तगी को बरकरार रखा। जिसे ठेकेदार को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था। ...और पढ़ें

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने होशियारपुर अधिकारी की सेवा से बर्खास्तगी बरकरार रखी।

    2. ठेकेदार को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था।

    3. याचिका कानूनी आधार और अत्यधिक देरी के कारण खारिज की गई।

    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने होशियारपुर जिले की एक नगर पंचायत के सेक्शन अधिकारी की सेवा से बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। अधिकारी को ठेकेदार को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और उसे पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

    हाई कोर्ट ने कहा कि याचिका में न तो कोई कानूनी आधार है और न ही इतनी लंबी देरी को नजरअंदाज किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह याचिका मुख्य रूप से मेरिट के अभाव तथा देरी और लापरवाही के आधार पर खारिज किए जाने योग्य है।

    जस्टिस नमित कुमार की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को एक ठेकेदार को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में दोषी ठहराया गया था। रिकार्ड से स्पष्ट है कि ठेकेदार लगभग एक वर्ष तक कथित उत्पीड़न झेलता रहा और अंतत उसने आत्महत्या कर ली। अदालत ने माना कि ऐसे मामले में सेवा से बर्खास्तगी का दंड देने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार मौजूद थे।

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    2016 में घटी थी घटना

    मामले के अनुसार 31 दिसंबर 2016 को ठेकेदार के बेटे के बयान पर भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। आरोप था कि नगर पंचायत के सेक्शन अधिकारी ने उसके पिता के लंबित बिल पास करने के लिए रिश्वत मांगी और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी। बाद में ठेकेदार ने आत्महत्या कर ली।

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    होशियारपुर के सत्र न्यायाधीश ने 8 नवंबर 2021 को अधिकारी को दोषी करार दिया और 10 नवंबर 2021 को उसे पांच वर्ष के कठोर कारावास तथा 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद 1 फरवरी 2022 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने 16 जून 2025 को विभागीय अपील दायर की, जो निर्धारित समय से 1215 दिन की देरी से दाखिल हुई थी।

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    पहली अपील देरी के कारण हुई थी खारिज

    पहले यह अपील केवल देरी के आधार पर खारिज कर दी गई थी। बाद में हाई कोर्ट ने 8 दिसंबर 2025 को उस आदेश को निरस्त करते हुए अपीलीय प्राधिकारी को देरी माफी आवेदन और अपील के गुण-दोष दोनों पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद भी अपीलीय प्राधिकारी ने 11 जून 2026 को अपील खारिज कर दी, जिसे वर्तमान याचिका में चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह सजा निलंबित होने के बाद आपराधिक अपील और दोषसिद्धि पर रोक हासिल करने के प्रयासों में व्यस्त था, इसलिए विभागीय अपील में हुई देरी माफ की जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि 1215 दिन की अत्यधिक देरी को माफ करने के लिए यह संतोषजनक आधार नहीं है।

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