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नौकरी में मिली सजा, मौत के बाद भी नहीं हुई खत्म; हाई कोर्ट ने पंजाब मार्कफेड ऑफिसर के बेटे की याचिका खारिज की

Published: Tue, 08 Sep 2026 07:00 AM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के जीवनकाल में सजा का आदेश जारी हो चुका हो तो मृत्यु के बाद कार्रवाई खत्म नहीं होती।

ये प्रतिकात्मक तस्वीर है।

ये प्रतिकात्मक तस्वीर है।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त अधिकारी की सजा बरकरार रखी।

  2. जीवनकाल में मिली सजा मृत्यु से समाप्त नहीं होती।

  3. धान स्टॉक कमी मामले में बेटे की याचिका खारिज।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। विभागीय जांच पूरी होने के बाद कर्मचारी के जीवनकाल में सजा का आदेश जारी हो चुका हो तो बाद में उसकी मृत्यु होने से वह कार्रवाई स्वत समाप्त नहीं हो जाती। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने धान के स्टाक में कमी के मामले में मार्कफेड के सेवानिवृत्त शाखा अधिकारी एमएस चीमा के खिलाफ हुई कार्रवाई को बरकरार रखते हुए उनके बेटे की याचिका खारिज कर दी।

जस्टिस संदीप मौदगिल ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु के समय अपील लंबित होने मात्र से पहले से दी गई सजा खत्म नहीं होती। मामला वर्ष 1997-98 की धान की फसल के स्टाक में कमी से जुड़ा है। स्टाक बनूड़ स्थित एनजीटी राइस मिल के परिसर में रखा गया था। उस समय चीमा मार्कफेड में शाखा अधिकारी के पद पर कार्यरत थे और 31 दिसंबर 2004 को सेवानिवृत्त हुए थे।

विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर छह जुलाई 2005 को उनके वेतनमान में दो स्तर की कमी करने की सजा दी गई। इस कमी का असर उनके सेवानिवृत्ति लाभों की गणना पर पड़ा। साथ ही संयुक्त अभिरक्षा वाले स्टाक का नुकसान मिलर से वसूल नहीं होने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों से ब्याज सहित बराबर अनुपात में वसूली का प्रावधान किया गया था।

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केवल लापरवाही आई सामने

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जांच में उनके पिता के खिलाफ धान के गबन या हेराफेरी का आरोप साबित नहीं हुआ। केवल लापरवाही सामने आई थी। स्टाक मिलर और अधिकारियों की संयुक्त अभिरक्षा में था और मार्कफेड ने मिलर के खिलाफ आपराधिक मामला, मध्यस्थता की कार्यवाही और वसूली का मुकदमा भी शुरू किया था।

हाई कोर्ट ने कहा कि गबन साबित न होने का अर्थ यह नहीं है कि अधिकारी की लापरवाही भी समाप्त हो गई। जांच अधिकारी ने पाया था कि अधिकारियों की लापरवाही के कारण मिलर को धान का अनधिकृत इस्तेमाल करने का अवसर मिला। इसलिए विभाग को सिद्ध हुई लापरवाही के लिए उचित दंड देने का अधिकार था।

26 लाख मूल्य के धान की कमी

कोर्ट ने कहा कि मामले में करीब 26 लाख रुपये मूल्य के धान की कमी थी और अधिकारियों ने स्टाक की सुरक्षा के अपने दायित्व का पर्याप्त निर्वहन नहीं किया। इसके बावजूद उन्हें बर्खास्त नहीं किया गया और न ही तत्काल पूरा नुकसान व्यक्तिगत रूप से चुकाने का आदेश दिया गया।

केवल वेतनमान में दो स्तर की कमी की गई। मिलर से नुकसान की वसूली नहीं होने पर ही अधिकारियों से वसूली की शर्त रखी गई थी। ऐसे में सजा को अनुपातहीन नहीं माना जा सकता।

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मौत के 4 साल बाद भी बरकरार कार्रवाई

एमएस चीमा की मृत्यु 26 सितंबर 2009 को हुई, जबकि उनके खिलाफ सजा का आदेश छह जुलाई 2005 को ही पारित हो चुका था। कोर्ट ने कहा कि संबंधित प्रस्ताव भी ऐसे मामले में वसूली की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति देता है, जहां कर्मचारी के जीवनकाल में वसूली का आदेश पारित हो चुका हो।

इसलिए चीमा की मृत्यु के बाद भी छह जुलाई 2005 का सजा आदेश अस्तित्व में रहा। हाई कोर्ट ने 2005, 2010 और 2012 के संबंधित आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

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