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    क्या आपकी थाली सुरक्षित है! मिलावट के खिलाफ चाहिए राष्ट्रीय खाद्य गुणवत्ता मिशन, देशभर की बनी जरूरत

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 01:12 PM (IST)

    खाद्य मिलावट, कमजोर निगरानी और गुणवत्ता की चुनौतियों के बीच राष्ट्रीय खाद्य गुणवत्ता मिशन की मांग उठी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित, शुद्ध और ...और पढ़ें

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    1. खाद्य सुरक्षा के बावजूद भोजन की गुणवत्ता उपेक्षित।

    2. मिलावट रोकने हेतु राष्ट्रीय खाद्य गुणवत्ता मिशन जरूरी।

    3. क्षमता निर्माण, निगरानी, पारदर्शिता मिशन के स्तंभ।

    सुरेश कुमार। भारत ने खाद्य सुरक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है। हमने बफर स्टाक बनाए, खरीद बढ़ाई, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया, कृषि उत्पादन बढ़ाया और किसानों की आय बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया। फिर भी एक प्रश्न उपेक्षित रहा है कि अंततः उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने वाले भोजन की गुणवत्ता क्या है? खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल कैलोरी प्राप्त करना नहीं हो सकता है।

    इसका अर्थ सुरक्षित, शुद्ध, पौष्टिक और विश्वसनीय भोजन होना चाहिए। बिना सही जानकारी, सुरक्षा या उपाय के दूध, घी, सब्जियां, फल, आटा, मसाले, खाद्य तेल, मिठाई या पैकेटबंद भोजन खरीदने वाला परिवार का स्वास्थ्य दांव पर लगा होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, असुरक्षित भोजन हर साल दुनिया भर में कई बीमारियां पैदा करता है।

    जब भोजन मिलावटी, दूषित या भ्रामक लेबल वाला होता है तो सबसे अधिक गरीब प्रभावित होते हैं, लेकिन नुकसान पूरे राष्ट्र को उठाना पड़ता है। वर्तमान में भारत की कृषि अर्थव्यवस्था एक बड़े विरोधाभास से जूझ रही है। एक तरफ, किसान अपने खेतों में सब्जी, फल और खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं लेकिन आमतौर पर उत्पाद को दबाव में बेच देते हैं।

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    लेखक सुरेश कुमार। 

    दूसरी ओर, उपभोक्ता फलों, सब्जियों, दुग्ध उत्पादों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए अधिक कीमत चुकाते हैं। किसान और उपभोक्ता के बीच थोक विक्रेता, परिवहनकर्ता, स्टाकिस्ट, प्रोसेसिंग करने वाले, खुदरा विक्रेता और कई तरह के बिचौलिए होते हैं जो खेत से बाहर आए उत्पाद के मूल्य का बड़ा हिस्सा पाते हैं। जहां किसान को बहुत कम मूल्य मिलता है, वहीं उपभोक्ता अधिक कीमत चुकाता है।

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    गुणवत्ता की भी गारंटी नहीं होती है। वास्तव में यह असुरक्षित भोजन पर आधारित व्यवस्था है। मिलावट इसलिए नहीं होती क्योंकि इसे रोकने के लिए कानून नहीं है, बल्कि इस कारण होती है क्योंकि बेईमानी अधिक लाभप्रद है और सजा का जोखिम बहुत कम है। उपभोक्ता शुद्धता को आसानी से जांच नहीं सकता है। धरातल पर कानून लागू करना कठिन है, प्रयोगशालाएं भी अपर्याप्त हैं और न्यायालयों में मुकदमे भी धीमे चलते हैं।

    गुणवत्ता को लेकर कई बार त्योहारों से पहले अधिकारी खानापूर्ति करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मिलावट एक बड़ा व्यवसाय बन गई है।मिलावटखोरी रोकने के लिए खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (एफएसएसएआइ) ने राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारण, जागरूकता, लाइसेंसिंग और विनियमन में उपयोगी काम किया है। फिर भी, कानून स्वयं लागू नहीं हो जाता है।

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    कानून पर वास्तविक अमल राज्य की खाद्य सुरक्षा मशीनरी पर निर्भर करता है, जो कई जगहों पर कर्मियों और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। राज्य खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण और स्थानीय एजेंसियों को स्ट्रीट वेंडर से लेकर डेयरियों, डिलीवरी चेन और प्रसंस्करण इकाइयों तक, सबकी निगरानी करनी होती है। मार्च 2026 में संसद में रखे गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि कितने बड़े स्तर पर मिलावट हो रही है।

    तीन वर्षों में 5.18 लाख से अधिक खाद्य नमूने जांचे गए। इनमें से 88,000 से अधिक मामले अर्थदंड सहित निस्तारित किए गए। 3,600 से अधिक दोषसिद्धियां हुईं और 1,100 से अधिक लाइसेंस रद किए गए। ऐसी स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती है।

    ऐसे में, स्वच्छ भारत के बाद भारत को खाद्य मिलावट के खिलाफ प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मिशन की जरूरत है। स्वच्छ सड़कें और शौचालय सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी थे। स्वच्छ भोजन इससे कम जरूरी नहीं है। अगला बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान राष्ट्रीय खाद्य गुणवत्ता मिशन होना चाहिए। इसमें वादा हो कि कोई भी नागरिक गरीबी, अज्ञानता, कमजोर नियमन या हेराफेरी के कारण असुरक्षित भोजन खाने को मजबूर नहीं होगा।

    यह मिशन पारदर्शी, समन्वित प्रणाली के माध्यम से मिलावट की जांच के लिए नई व्यवस्था तैयार करेगा, जिसमें एआइ, डिजिटल ट्रेसिंग, मोबाइल टेस्टिंग और सार्वजनिक डैशबोर्ड शामिल होंगे। इस मिशन की शुरुआत दुकानों से नहीं, बल्कि खेत से होनी चाहिए। भोजन की गुणवत्ता मिट्टी, पानी, बीज, कीटनाशक उपयोग, कटाई, भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण और पैकेजिंग से तय होती है।

    प्रदूषित पानी में उगाई गई सब्जियां ब्रांडिंग से सुरक्षित नहीं हो सकती हैं। कृषि विभाग, मंडी बोर्ड, खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण, प्रयोगशालाओं, पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों को एक प्रणाली के रूप में काम करना होगा। मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, मिट्टी स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और पर्यावरणीय सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय खाद्य शुद्धता मिशन के पांच स्तंभ होने चाहिए।

    पहला, क्षमता निर्माण-जिसके तहत हर जिले में प्रशिक्षित खाद्य सुरक्षा अधिकारी, मोबाइल टेस्टिंग वैन, तेज प्रयोगशाला पहुंच और अभियोजन सहायता शामिल है। दूसरा, निगरानी-जिसमें उच्च जोखिम वाले खाद्य पदार्थों की नियमित जांच हो। ऐसा केवल शिकायत मिलने पर न किया जाए। तीसरा, पारदर्शिता- नमूना परीक्षण, उल्लंघन, अभियोजन और बार-बार अपराध करने वालों की तस्वीरें जिलावार सार्वजनिक डैशबोर्ड पर प्रदर्शित की जाएं।

    चौथा, निरोधक-जिसमें हानिकारक रसायनों, विषैले रंगों या नकली माल से मिलावट पर लाइसेंस रद करने, जब्ती, अभियोजन और अर्थदंड से जुड़ी सजा हो। पांचवां, मूल्यवर्धन- जिसमें किसानों, सहकारी समितियों की स्वच्छता, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग में मदद दी जाए ताकि वे अधिक मूल्य प्राप्त कर सकें और उपभोक्ताओं का भरोसा कायम हो।

    यह किसान और उपभोक्ता दोनों के हित में है। भारतीय खाद्य ब्रांडों को घरेलू और वैश्विक सम्मान तभी मिलेगा जब गुणवत्ता विश्वसनीय होगी। इसके लिए उपभोक्ता को भी भागीदार बनाना होगा।

    स्कूलों में बुनियादी खाद्य सुरक्षा पढ़ाई जाए ताकि नागरिक लेबल पढ़ना, एक्सपायरी डेट चेक करना, संदिग्ध उत्पाद को पहचानना और शिकायत दर्ज कराना जानें। आरडब्ल्यूए, पंचायतों, बाजार समितियां और स्थानीय निकायों को भी सक्रिय किया जाना चाहिए। मिलावट रिपोर्ट करने वाला नागरिक एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चौकीदार है। समय आ गया है कि हम खाद्य सुरक्षा से खाद्य शुद्धता की ओर बढ़ें। गुणवत्ता के बिना कल्याण अधूरा है।

    (लेखक पंजाब के मुख्य सचिव रहे हैं)

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