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भगवान शिव का 6वां ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर', जहां शिवलिंग पर हमेशा चढ़ा रहता है चांदी का कवच

Updated: Thu, 13 Aug 2026 07:00 AM (IST)

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से पांचवां है, जिसके दर्शन मात्र से बाधाएं दूर होती हैं। यह मंदिर त्रिपुरसुर और कुंभकर्ण के पुत्र भीम से जुड़ी पौराणिक कथाओं के साथ, श्रावण मास में विशेष महत्व रखता है।

भारत का छठा ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर

भारत का छठा ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर

HighLights

  1. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पांचवां भीमाशंकर।

  2. त्रिपुरसुर और कुंभकर्ण के पुत्र भीम से जुड़ी कथाएं।

  3. चांदी के कवच से ढका रहता है ज्योतिर्लिंग का मूल स्वरूप।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग जिनके दर्शन मात्र से ही तमाम तरह की बाधाएं, ग्रह दोष, नकारात्मक शक्तियां और बुरे विचार दूर हो जाते हैं। श्रावण मास में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से किसी एक भी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना उतना ही पुण्य माना जाता है, जितना की चारधाम की यात्रा।

क्योंकि इस दौरान भगवान शिव धरती पर निवास करते हैं और कहते हैं कि सावन के पावन महीने में जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी प्रार्थना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सावन विशेष पर आज हम बात करेंगे शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से छठवें ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर' के बारे में।

शिव महापुराण में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के श्वलोक जिक्र किया गया है, जिसमें प्रमुख भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भी शामिल है।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारममलेश्वरम् ॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥

वारणस्यां तु विश्र्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे हिमालये तु केदारं घृश्नेशं च शिवालये ॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥

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भीमाशंकर मंदिर का इतिहास

त्रेतायुग में त्रिपुरसुर नाम का दैत्य था। उसने भगवान शंकर की पूजा कर उनसे अमरता का वरदान मांग लिया। भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हुए कहा कि, कोई भी पुरुष या महिला तुम्हें नहीं मार सकता। भगवान शंकर के आशीर्वाद से वह तीनों लोक में जमकर आतंक मचाने लगा। सभी देवता और मनुष्य उसके आतंक से परेशान हो गए, तब सभी देवता भगवान शंकर के शरण में पहुंचे। उन्होंने उस दैत्य को खत्म करने का फैसला लिया।

त्रिपुरासुर को मरने के लिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से प्रार्थना की कि वे इस काम को पूरा करने में उनकी मदद करें। भगवान शिव और माता पार्वती ने तब अर्धनारी नटेश्वर के रूप में एक नया रूप धारण किया और कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर को मौत के घाट उतारा।

त्रिपुरासुर की मौत के बाद उसकी पत्नियां (डाकिनी और शाकिनी) भगवान शिव के पास त्रिपुरासुर के बिना अपने अस्तित्व के बारे में पूछा। तब भगवान शिव ने दोनों को अमरता का वरदान दिया।, जो उन्होंने त्रिपुरासुर को प्रदान किया था। तभी से भीमाशंकर को 'डाकिन्यांभीशंकरम' के नाम से जाना जाता है।

भीमाशंकर मंदिर से जुड़ी जानकारी

भीमाशंकर मंदिर चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर की करीब 3.5 मीटर चौड़ा और करीब 15 मीटर लंबाई में है। बताया जाता है कि, छात्रपति शिवजी महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था, जिसके बाद 18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने इस मंदिर के शिखर को बनवाया था।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं,जिसमें से एक यह भी है कि, कुंभकर्ण जिसके पुत्र का नाम भीम था अपने पिता के मौत का बदला लेने चाहता था। इसके लिए उसने घोर तपस्या के जरिए ब्रह्मा जी से विजयी होने का वरदान हासिल किया। वरदान पाने के बाद उसने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया। जिसके बाद भगवान शिव ने राक्षस भीम से युद्ध करके उसका वध किया। इसके बाद सभी देवताओं ने महादेव से वहीं पर शिवलिंग के रूप में स्थापित होने का आग्रह किया जिसे भोले बाबा ने स्वीकार कर लिया। तभी से इस ज्योतिर्लिंग को भीमांशकर के नाम से जाना जाता है।

आपको बता दें कि, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पर ज्यादातर समय चांदी का श्रृंगार रूपी कवच चढ़ा होता है, जिससे अधिकतर समय ज्योतिर्लिंग के मूल स्वरूप के दर्शन नहीं हो पाते हैं। दिन में केवल कुछ समय के लिए ही इसके चांदी के कवच को हटाया जाता है।

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Source- shreebhimashankar

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।