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    जानिए केरल के उस अनोखे शिव मंदिर के बारे में, जो साल में सिर्फ एक महीने के लिए खुलता है

    Updated: Wed, 10 Jun 2026 02:00 PM (IST)

    केरल के कन्नूर जिले में स्थित बावाली नदी के किनारे बसा कोट्टियूर शिव मंदिर, जिसे दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है। यह मंदिर साल में 11 महीने बंद रहत ...और पढ़ें

    केरल में स्थित कोट्टियूर शिव मंदिर (Picture Credit AI- Generated Image)

    केरल में स्थित कोट्टियूर शिव मंदिर (Picture Credit AI- Generated Image)

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत में कई ऐसे रहस्यमयी मंदिर हैं, जिनकी परंपरा और रीति-रिवाज सभी को हैरत में डाल देते हैं। केरल के कन्नूर जिले में स्थित कोट्टियूर शिव मंदिर जो दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं के बीच काफी फेमस है। इस मंदिर को दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है।

    उत्तरी केरल का प्राचीन तीर्थस्थल कोट्टियूर शिव मंदिर शांत पहाड़ों और जंगलों के बीच में बसा है। बावली नदी के विपरीत किनारों पर दो मंदिर बने हैं, जिनमें एक का नाम अक्करे कोट्टियूर और दूसरा इक्करे कोट्टियूर है।

    अक्करे कोट्टियूर मंदिर वैशाख महोत्सव के दौरान सिर्फ 28 दिनों के लिए ही खुलता है, जो मई-जून के महीनों में पड़ता है, और पूरे साल बंद रहता है। जबकि इस दौरान इक्करे कोट्टियूर मंदिर बंद रहता है।

    मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

    मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाओं के मुताबिक, ब्रह्मा पुत्र दक्ष प्रजापति अपनी पुत्री सती देवी के भगवान शिव से विवाह से खुश नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री सती देवी और भगवान शिव को बिना बताए इस स्थान पर यज्ञ करने का फैसला लिया। सती देवी को अपने पिता के इस इरादे के बारे में जरा भी आभास नहीं था, इसलिए वे यज्ञभूमि पर आईं, लेकिन उनका काफी अपमान हुआ।

    पिता के शब्दों से आहत और अपमानित होकर उन्होंने अपनी योगशक्ति से आत्मदाह कर लिया। इस घटना से व्यथित और गुस्से में आकर शिव जी ने वीरभद्र रूप में तांडव ऋतम किया और दक्ष का सिर काट दिया।

    भगवान विष्णु और ब्रह्मा के शांत कराने के बाद भगवान शिव ने दक्ष का सिर बकरी के सिर से बदल दिया। इसलिए इस स्थान को त्रिमूर्ति भगवान ब्रह्म, भगवान विष्णु और भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का स्थान माना जाता है।

    इक्कारे कोटियूर अन्य मंदिरों की तरह ही एक औपचारिक मंदिर परिसर है, जबकि अक्करे कोटियूर मंदिर एक तालाब के बीचों-बीच स्थित है, वो भी बिना संरचना के स्वयंभू शिवलिंग नदी के पत्थरों से बने ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। वैशाख महोत्सव के दौरान 28 दिन के लिए एक खास जंगल भव्य शिव मंदिर का रूप ले लेता है। वहां कोई दीवारें, छत या धातु नहीं होती, बस एक खुला मंदिर होता है।

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    केरला के जंगलों में कोटियोर शिव मंदिर

    (Picture Credit AI- Generated Image)

    11 महीने बाद सिर्फ 28 दिनों के लिए खुलता है मंदिर 

    शिवजी से जुड़ा यह विशेष मंदिर साल के 11 महीने बंद रहता है और केवल वैशाख के दौरान दर्शन के लिए खुलता है। मंदिर को अस्थायी रूप देने के लिए जंगल के ही बांस और पेड़ पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। यहां आने वाले तीर्थयात्री ओरापो नाम की एक खास चीज अपने साथ ले जाते हैं। ये कूटे बांस से बनी चीजें होती हैं, जो बिल्कुल भृगु ऋषि के पत्थर जैसे दिखाई देती है।

    जब वैशाख महोत्सव खत्म हो जाता है, तब हर ढांचे को हटा दिया जाता है। जंगली जंगल महादेव के इस पवित्र स्थान को वापस अपना बना लेते हैं। यह मंदिर एक बार फिर से 11 महीनों के लिए प्राकृतिक में विलीन हो जाता है। 

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।