लंका विजय के बाद संगम तट पर क्यों लेटे थे हनुमान जी? जानिए प्रयागराज के इस दिव्य मंदिर की कहानी
प्रयागराज के दारगंज में स्थित लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर 'तीर्थराज' की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह मंदिर 600-700 ...और पढ़ें
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सोते हुए हनुमान की मूर्ति प्रयागराज (Picture Credits- AI Images)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म शास्त्रों और वेदों में प्रयागराज को 'तीर्थराज' यानी सभी तीर्थों का राजा कहा जाता है। प्रयागराज के दारगंज मोहल्ले में गंगा जी के किनारे लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर है।
इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि संत समर्थ गुरु रामदास जी ने यहां भगवान हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की थी। मंदिर परिसर में हनुमान जी के अलावा शिव-पार्वती, गणेश, भैरव, दुर्गा, काली एवं नवग्रहों की मूर्तियां स्थापित हैं।
मंदिर में हनुमान जी के साथ कई और देवी-देवता
मान्यताओं के मुताबिक हनुमान जी की यह मूर्ति दक्षिणाभिमुखी और 20 फीट लंबी है। जो धरातल से करीब 6 से 7 फीट नीचे है। प्रयागराज में इन्हें बड़े हनुमानजी, किले वाले हनुमानजी, लेटे हुए हनुमानजी और बांध वाले हनुमान जी के नाम से जाना जाता है।
इस प्रतिमा के बारे में माना जाता है कि, इनके बाएं पैर के नीचे कामदा देवी और दाएं पैर के नीचे अहिरावण दबा है। उनके दाएं हाथ में राम-लक्ष्मण और बाएं हाथ में गदा है। यहां आने वाले भक्तों का कहना है कि यहां सभी की मनोकामनाएं पूरी होती है।
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मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं
यहां के बारे में एक कथा यह भी प्रचलित है कि लंका पर विजय हासिल करने के बाद जब हनुमान जी लौट रहे थे तो रास्ते में उन्हें थकान महसूस होने लगी। तो सीता माता के कहने पर वह यहां संगम के तट पर लेट गए।
इसी को ध्यान में रखते हुए यहां लेटे हनुमान जी का मंदिर बन गया। यह मंदिर कम से कम 600 से 700 साल पुराना बताया जाता है। साल में एक बार गंगा मईया खुद हनुमान जी को स्नान कराने के लिए आती है।
पवित्र गंगा नदी से स्नान करने का रहस्य
पौराणिक मान्यता के मुताबिक, जब हनुमान जी ने लंका विजय में रामजी की मदद कर राक्षसों का अंत किया तो वे थकान के कारण प्रयागराज के संगम तट पर आकर लेट गए थे। तभी से यह स्थान पवित्र और दिव्य माना जाने लगा। धार्मिक मत यह है कि, उस दिन से मां गंगा साल में एक बार हनुमान जी को स्नान कराने के लिए आती हैं।
इस स्नान से न सिर्फ क्षेत्र बल्कि पूरे देश की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-शांति की स्थापना होती है। यही वजह है कि इस दिन को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था और उत्साह देखने को मिलता है।
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो मानसून के दौरान जब गंगा और यमुना का जलस्तर काफी बढ़ जाता है, तो बाढ़ का पानी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर जाता है। हालांकि इस घटना को धार्मिक नजरिए से बेहद पावन और दिव्य माना जाता है।
Source- Government of Uttar Pradesh
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