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महाकाल को क्यों चढ़ाई जाती है राख? भस्म आरती का यह रहस्य नहीं जानते होंगे आप!

Published: Thu, 06 Aug 2026 12:30 PM (IST)

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का विशेष महत्व है, जो सूर्योदय से पहले की जाती है। यह अनुष्ठान ...और पढ़ें

महाकाल भस्म आरती, उज्जैन मध्य प्रदेश

महाकाल भस्म आरती, उज्जैन मध्य प्रदेश

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन के पवित्र महीने में मध्य प्रदेश में स्थित उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर जो भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है, कई भक्तों को दर्शन के लिए अपनी ओर आकर्षित करता है। भक्त यहां बाबा का आशीर्वाद लेने आते हैं, लेकिन इस दौरान एक अनुष्ठान उनका मन मोह लेता है। भस्म आरती हिंदू परंपरा में किसी भी अन्य अनुष्ठानों से सूर्योदय से ठीक पहले की जाने वाली एक रस्म है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से करीब 90 मिनट पहले) में प्रत्येक सुबह की जाने वाली भस्म आरती का वर्णन हिंदू पौराणिक कथाओं में भी देखने को मिलता है। लेकिन कभी सोचा है कि, भगवान महाकाल की पूजा में राख का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? यह सदियों पुरानी परंपरा कहां और कैसे शुरू हुई? जानिए भारत के सबसे अनोखे मंदिर अनुष्ठानों में से एक के पीछे की कहानी के बारे में।

महाकाल भगवान कौन हैं?

हिंदू धर्म ग्रंथ और शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव के ही एक स्वरूप को महाकाल के नाम से जाना जाता है। महाकाल का मतलब है, 'काल और मृत्यु का स्वामी'। उनके बारे में कहा जाता है कि, वे काल और मृत्यु से भी परे हैं, इसी कारण उन्हें 'कालों के काल' की भी उपाधि मिली है।

भगवान शिव का यह रूप शाश्वत सच्चाई का प्रतीक है। हर जीव जन्म लेता है, जीवन जीता है और आखिर में पंच तत्वों में विलीन हो जाता है। इसलिए महाकाल की पूजा को आत्मचिंतन, सांसारिक मोह से मुक्ति और मोक्ष की ओर ले जाने वाला मार्ग माना जाता है।

भगवान महाकाल की पूजा में राख का इस्तेमाल क्यों?

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, पवित्र राख सिर्फ भेंट नहीं है, बल्कि अस्थायी जीवन की गहरी याद दिलाता है। यह अनुष्ठान भक्तों को अहंकार, आसक्ति और भौतिक इच्छाओं को त्याग कर उन्हें धर्म, सच्चाई, और आध्यात्मिक विकास में ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

कई आध्यात्मिक गुरु इस अनुष्ठान को शिव को महादेव में बदलने का प्रतीक मानते हैं, जो दिव्य शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है। शास्त्रों में शिव को अनंत, निराकार चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया है। ऐसे में यह अनुष्ठान उनके उस रूप को दर्शाता जिसकी भक्त पूजा कर सके। राख इस बात का भी प्रतीक है कि, हर मनुष्य का शरीर आखिर में मिट्टी में मिल जाता है, जबकि आत्मा अमर रहती है।

mahakaal bhasma aarti

भस्म आरती की पौराणिक कथा

महाकालेश्वर मंदिर की उत्पत्ति का वर्णन शिव महापुराण में भी देखने को मिलता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, प्राचीन नगर अवंतिका (वर्तमान का उज्जैन) में एक समय दूषण नाम का एक शक्तिशाली राक्षस ने काफी आतंक मचा रखा था, जिसने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था। दूषण वेदों, धार्मिक रीति-रिवाजों और नगर के भक्तों को खत्म करना चाहता था।

स्थानीय ब्राह्माणों की प्रार्थनाओं को सुनकर भगवान शिव ने उनकी रक्षा के लिए अपने उग्र स्वरूप महाकाल को प्रकट किया। जब दूषण ने आक्रमणों को रोकने से मना कर दिया, तो भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली और उस राक्षस को राख में बदल दिया।

मंदिर परंपरा के अनुसार भगवान शिव गहन ध्यान में जाने से पहले उस राख को अपने शरीर पर लगाया था। माना जाता है कि, इसी घटना से महाकाल को भस्म अर्पित करने की परंपरा की प्रेरणा मिली।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।

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