श्रीकालहस्ती मंदिर का रहस्य: वायु लिंग और राहु-केतु दोष निवारण का प्रसिद्ध धाम, कहलाता है दक्षिण का कैलाश
श्रीकालहस्ती मंदिर दक्षिण भारत का एक प्राचीन और शक्तिशाली शिव मंदिर है, जिसे 'दक्षिण कैलाश' भी कहते हैं। यह वायु लिंगम, राहु-केतु दोष निवारण और भक्तों ...और पढ़ें

श्रीकालहस्ती मंदिर: वायु लिंगम और राहु-केतु दोष निवारण का अद्भुत धाम (Picture Credit: Unsplash.com)
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श्रीकालहस्ती मंदिर 'दक्षिण कैलाश' के नाम से प्रसिद्ध है।
यह वायु तत्व का प्रतीक 'वायु लिंगम' मंदिर है।
राहु-केतु दोष निवारण के लिए विशेष पूजा होती है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन का महीना हो और भगवान शिव के खास मंदिरों का जिक्र न हो ऐसा भला हो सकता है। हमारे देश में 12 ज्योतिर्लिंग अपने आप में भिव भक्ति से पूर्ण हैं और सावन के पूरे महीने इनमें भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। वहीं कुछ ऐसे धार्मिक स्थल भी हैं जिनकी एक अद्भुत कथा है और आज भी वो शिव भक्ति के लिए प्रसिद्द हैं।
जी हां, हम बात कर रहे हैं एक ऐसे शिव मंदिर की जो एक शिव भक्त की अटूट भक्ति को दिखाता है और श्रद्धालुओं के बीच अपना अनोखा स्थान रखता है। ये मंदिर है दक्षिण भारत का श्रीकालहस्ती मंदिर। श्री कालाहस्ती मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पुराने और शक्तिशाली शिव मंदिरों में से एक है, जो आंध्र प्रदेश के तिरुपति के पास स्वर्णमुखी नदी के किनारे स्थित है। इसे 'दक्षिण कैलाश' के नाम से भी जाना जाता है। इस शिव मंदिर की कहानी एक शिव भक्त की भक्ति को दिखाती है। आइए आपको बताते हैं इसका रहस्य और इससे जुड़ी कथाओं के बारे में।
मंदिर का नाम श्रीकालहस्ती कैसे पड़ा?
इस मंदिर का नाम उन तीन भक्तों के नाम पर पड़ा है, जिन्होंने भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट भक्ति दिखाई और मोक्ष की प्राप्ति की। वो तीन भक्त थे- श्री (मकड़ी) जिसे धैर्य और समर्पण का प्रतीक माना जाता है और उसने शिवलिंग को धूल और बारिश से बचाने के लिए उसके चारों ओर जाला बुना। दूसरा काल (सांप) जिसने अपनी बुद्धिमानी से शिवलिंग के चारों ओर भेंट के रूप में कीमती पत्थर रखे और तीसरा हस्ती (हाथी) जिसे शक्ति और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि यह हाथी शिवभक्ति दिखाने के लिए रोज शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए अपनी सूंड में जल भरकर लाता था कर उसी जल से शिवलिंग को स्नान कराता था। जब हाथी पानी से शिवलिंग को साफ करता था, तब मकड़ी उसकी रक्षा के लिए नियमित जाला फिर से बुनती थी।
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एक दिन जलाभिषेक करते हुए हाथी ने अनजाने में मकड़ी का जाला तोड़ दिया, जिससे उनके बीच झगड़ा हो गया। इस झगड़े में सांप भी शामिल हो गया और इस संघर्ष में तीनों की जान चली गई। उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। उन तीनों भक्तों की भक्ति को देखते हुए इस मंदिर का नाम उनके नाम पर ही रखा गया।
भक्त कनप्पा के लिए प्रसिद्द है मंदिर
प्राचीन काल में कन्नप्पा का जन्म एक शिकारी जनजाति में हुआ था और उन्हें रीति-रिवाजों या वेदों का ज्ञान नहीं था। फिर भी उनका मन पवित्र था और शिव के प्रति अटूट प्रेम से भरा था। एक दिन, शिकार करते समय, उन्होंने जंगल में शिवलिंग देखा उसी पल से, उन्होंने अपने सरल तरीके से भगवान शिव की पूजा शुरू कर दी।
उन्होंने भोजन के रूप में ताजा मांस चढ़ाया। अभिषेक के लिए अपने मुंह से नदी का पानी डाला और दिन-रात एक रक्षक की तरह शिवलिंग की देखभाल की। उनकी पूजा का तरीका भले ही अनोखा था, लेकिन भगवान ने इसे स्वीकार किया क्योंकि यह पूरी ईमानदारी से किया गया था। एक दिन, कन्नप्पा ने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से खून बह रहा है।
बिना किसी हिचकिचाहट के, उन्होंने अपनी आंख निकाली और खून बहना रोकने के लिए उसे लिंग पर रख दिया। ऐसे ही कनप्पा ने अपनी दूसरी आंख भी शिवलिंग पर अर्पित कर दी। उसकी अटूट भक्ति को देखकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और उसे मोक्ष का आशीर्वाद दिया। साथ ही, यह भी वरदान दिया कि उसका स्थान हमेशा शिवभक्तों में सर्वोपरि रहेगा।

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वायु लिंगम और दक्षिण का कैलाश नाम से है प्रसिद्द
श्री कालहस्ती 'पंच भूत स्थलों' में से एक है, जो वायु तत्व का प्रतीक है। एक बार वायु देव ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, 'तुम हमेशा के लिए इस पवित्र लिंग में हवा के रूप में विद्यमान रहोगे।
मेरे भक्त यहां ली जाने वाली हर साँस में तुम्हारी उपस्थिति महसूस करेंगे।' उसी समय से यह वायु लिंगम के रूप में जाना जाता है। यही नहीं इसे दक्षिण कैलाशम नाम से भी जाना जाता है जहां के लिए मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं विद्यमान हैं।
राहु और केतु की पूजा के लिए प्रसिद्द है मंदिर
इस मंदिर से जुड़ी एक और कथा है जो राहु केतु से जुड़ी है और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें यह आशीर्वाद दिया कि जो भी इस मंदिर में राहु-केतु दोषों को दूर करने के लिए पूजा करेगा उसके सभी कष्ट दूर होंगे। उसी समय से इस मंदिर को राहु-केतु दोष निवारण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
वास्तव में दक्षिण भारत का यह मंदिर अद्भुत है और कई भक्तों की कथाओं को मिश्रित करके तैयार किया गया एक धार्मिक स्थल है। सावन के महीने में आप भी ज्योतिर्लिंगों की पूजा के साथ इस मंदिर में भी भगवान शिव के दर्शन के लिए जा सकते हैं।
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Source: srikalahastitemple.org.in
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