बिना मूर्ति का अनोखा मंदिर, जहां टैक्स भी भरा जाता है 'दुर्योधन' के नाम पर!
केरल के पोरुवाझी पेरुविरुथी मालनादा मंदिर में महाभारत के खलनायक दुर्योधन की पूजा की जाती है। जानिए इसके पीछे का कारण और पौराणिक कथा?

केरल में दुर्योधन का मंदिर (AI Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू महाकाव्य महाभारत में कौरवों में सबसे बड़े राजकुमार दुर्योधन ने बचपन से ही पांडवों के प्रति द्वेष और जलन की भावना रखने के साथ काफी अत्याचार किया। राजा बनने की लालसा में ईर्ष्या और गुस्से ने उसे अपने नियंत्रण कर लिया, जिसके कारण उसने अपनी भाभी द्रौपदी के साथ भी दुर्व्यवहार किया, सुलह करने की बजाए युद्ध को चुना। उसके इतने अत्याचार के बावजूद केरल का एक मंदिर महाभारत के घृणित खलनायक को क्यों समर्पित है? आइए जानते हैं इसके बारे में।
महाभारत में दुर्योधन जिसका असल नाम सुयोधन बताया जाता है, उसके कई अन्यायपूर्ण कार्यों के कारण खलनायक कहा जाता है। इस कौरव राजा में कई अच्छे गुण भी शामिल थे। दुर्योधन जाति व्यवस्था के खिलाफ, कर्ण के साथ उसकी अटूट मित्रता, नियमों को कड़ाई से मानना और दलितों के प्रति उसकी करुणा काफी प्रशंसनीय थे।

केरल का कौन-सा मंदिर दुर्योधन को समर्पित
केरल के पोरुवाझी पेरुविरुथी मालनादा मंदिर महाभारत के प्रसिद्ध खलनायक दुर्योधन को समर्पित है। स्थानीय कथाओं के मुताबिक, पांडव जब अपना वनवास काल भोग रहे थे, तब दुर्योधन उन्हें खोजते-खोजते केरल के दक्षिणी जंगलों के पहाड़ियों तक जा पहुंचा।
प्यास और थकान से चूर उसने मालनाद अप्पोप्पन के निवास स्थान से पीने को पानी मांगा, जो उस इलाके का एक पुजारी और शासक था। उसकी विनती सुनकर एक बूढ़ी महिला ने सम्मान के प्रतीक के रूप में उसे ताड़ी पिलाई। दुर्योधन ने ताड़ी पीकर अपनी प्यास को बुझाई।
उस दौरान जब उस बूढ़ी महिला ने दुर्योधन के भव्य वस्त्र और आभूषण देखे, तो उसे पता चला कि, वे एक राजा हैं जो कुरुव जाति की एक अछूत महिला द्वारा दी गई ताड़ी को पी रहे हैं।
दुर्योधन जिसे जाति व्यवस्था पर भरोसा नहीं था, वे उस महिला के इस व्यवहार से काफी प्रसन्न हुआ और कृतज्ञता जाहिर करते हुए पास की ही एक पहाड़ी पर बैठ गया और ग्रामीणों के कल्याण के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। इसके अलावा दुर्योधन ने ग्रामीणों को किसानी करने हेतु जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े भी दान में दिए।
केरल का पोरुवाझी पेरुविरुथी मंदिर ठीक उसी जगह पर बना हुआ है, जहां दुर्योधन ने ध्यान किया था। इसके अलावा मंदिर का संपत्ति कर भी दुर्योधन के नाम पर किया जाता है। जो इस बात का प्रतीक है कि, स्थानीय लोग उनका कितना सम्मान और प्यार करते हैं और आज भी इस मंदिर के पुजारी कुरुव समुदाय से ही हैं।
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इस मंदिर की खासियत जानकर हैरान हो जाएंगे?
केरल के इस मंदिर की खासियत यह है कि, इसमें कोई भी मूर्ति नहीं है और न ही प्रवेश द्वारा पर बना गोपुरम (मंदिर का शिखर)। यहां सिर्फ ऊंचा चबूतरा है जिसे मंडपम या स्थानीय भाषा में अलथारा कहा जाता है। पोरुवाझी पेरुविरुथी मलादनादा मंदिर सिर्फ एक खुला चबूतरा है। भक्त मंडपम में खड़े होकर अपनी प्रार्थना करते हैं।
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