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सूर्यास्त के बाद वीरान हो जाता है 900 मंदिरों वाला यह पर्वत, रात में क्यों है इंसानों की 'नो एंट्री'?

Updated: Sun, 16 Aug 2026 10:37 AM (IST)

गुजरात के भावनगर के पास शत्रुंजय पहाड़ी पर 900 से अधिक जैन मंदिर स्थित हैं, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभ देव से संबंधित हैं। इस पवित्र स्थल की खास ...और पढ़ें

पालीताना, शत्रुंजय पहाड़ी 900 मंदिरों का शहर

पालीताना, शत्रुंजय पहाड़ी 900 मंदिरों का शहर

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पहाड़ों को याद करते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले सुंदर-सुंदर वादियां, हरियाली, पेड़-पौधे और हल्की सी ठंडक आती है। भारत में ऐसी कई जगह है जहां आप इस तरह के नजारे का लुफ्त उठा सकते हैं।

लेकिन आपको जानकार हैरान होगी कि, भारत देश में एक ऐसा भी पर्वत है, जहां 10-20 मंदिर नहीं, बल्कि 900 मंदिर स्थित है। इस वजह से यह पर्वत कई मायनों में खास हो जाता है।

शत्रुंजय पर्वत पर स्थित है 900 मंदिर 

गुजरात के भावनगर से करीब 51 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित हलचल और धूल भरा शहर पालीताना, शत्रुंजय पहाड़ी की पहाड़ियों पर बसा है यह अनोखा मंदिरों का शहर, जहां जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभ देव जी ने पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर में अपना पहला उपदेश देकर पवित्र किया था। हालांकि मंदिर तक की चढ़ाई बेहद कठिन है।

जैन धर्म के अत्यंत पवित्र तीर्थस्थलों में से एक शत्रुंजय एक अद्भुत पहाड़ी पर है, जो 900 साल से भी ज्यादा पुराना मंदिर है। कहा जाता है कि, जैन धर्म के संस्थापक आदिनाथ (जिन्हें ऋषभ के नाम से भी जाना जाता है) ने पहाड़ी के शिखर पर रायन पेड़ के नीचे ध्यान किया था। यह मंदिर कई समूहों में बांटा हुआ है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को करीब 3750 से ज्यादा पत्थर की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

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मंदिर में मुस्लिम संत की मजार भी

हर साल नवंबर से दिसंबर महीने के बीच कार्तिक पूर्णिमा के दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु शत्रुंज्य पहाड़ियों पर दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मान्यताओं के मुताबिक जैन धर्म के संस्थापक आदिनाथ ने पर्वत के शिखर पर एक पेड़ के नीच गहरी तपस्या की थी।

यहां भगवान आदिनाथ का मंदिर भी है। इसके अलावा यहां मुस्लिम संत अंगार पीर की मजार भी है। कहा जाता है कि, मुगलों से शंत्रुजय पर्वत की रक्षा के लिए मुस्लिम लोग यहां आकर मत्था टेकते हैं।

शाम होने के बाद कोई नहीं रुकता पहाड़ियों पर

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि, सूर्यास्त के बाद पहाड़ियों पर किसी को भी रुकने की अनुमति नहीं है। सूरज ढलने के बाद पुजारी, तीर्थयात्री हर कोई नीचे आ जाता है। पूरी पहाड़ी रात के साये में गहरे सन्नाटे डूब जाती है और सुबह होते ही यह फिर से जीवित हो उठती है।

यहां का प्रत्येक मंदिर न किसी तीर्थंकार को समर्पित है और न ही आध्यात्मिक गुरु को, माना जाता है कि, यह पर्वत देवताओं का निवास स्थान माना जाता है, जो सूर्यास्त होने के बाद यहां विश्राम करने आते हैं। इसी वजह से यहां किसी को रुकने नहीं दिया जाता है।

Source- gujarattourism

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