रामचरितमानस से समझें, आखिर क्यों बेईमानी की दौलत आपके पास होकर भी आपकी नहीं?
रामचरितमानस के अनुसार, बेईमानी से कमाया धन व्यक्ति को भौतिक सुख तो दे सकता है, पर कभी मानसिक शांति नहीं। गलत तरीके से अर्जित संपत्ति पास होकर भी अपनी नहीं होती, जैसे दलदल पर बना महल।

रामचरितमानस की चौपाई से समझें बेईमानी का पैसा क्यों खराब? (Picture Credits- AI Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज की इस आधुनिक दुनिया में हर कोई अमीर बनने की चाह रखता है। हर किसी को आलीशान लाइफस्टाइल चाहिए। आज ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि, जिसका पास जितना पैसा है, वो उतना ही सुखी है।
लेकिन सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। लोग पैसा कमाने के लिए तरह-तरह के अनैतिक कार्यों को करते हैं। शास्त्रों में बेईमानी की कमाई को लेकर बेहद कड़बी बात कही गई है।
बेईमानी का पैसा क्यों नहीं कमाना चाहिए?
सदियों पहले गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने 'रामचरितमानस' में बेईमानी और गलत तरीके से कमाए गए पैसों को लेकर ज्ञान दिया था, जिसे आज के समय में हर किसी को जानना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार गलत रास्तों पर चलकर व्यक्ति धनवान तो बन सकता है, लेकिन वो पैसा कभी भी उसे मानसिक सुख नहीं देगा। आइए जानते हैं आखिर क्यों बेईमानी की राह पर चलकर पैसा नहीं कमाना चाहिए?
रामचरितमानस सुंदरकांड के तीसरे श्लोक में कहा गया है कि-
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
अर्थात्- राम विमुख यानी भगवान राम से अलग होने पर व्यक्ति की संपत्ति और प्रभुता चली जाती है। ऐसे में उसका मिलना न मिलना एक समान है।
आसान भाषा में समझें तो राम से अलग होने का मतलब है; कि ईमानदारी, मेहनत और सच्चाई की बिना ऐसी सफलता और संपत्ति जो गलत तरीके से हासिल की गई हो वो 'पाई बिनु पाई' यानी वो आपके पास होकर भी आपके पास नहीं रहती है।
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उदाहरण से समझे श्लोक का असल अर्थ
अगर इसे उदाहरण के रूप में समझे तो, जैसे एक दलदल के ऊपर महल बना दें तो दूर से देखने पर तो वो महल बेहद भव्य लगेगा। लोग कामयाबी की तारीफ भी करेंगे, लेकिन उस महल के मालिक को पता होगा कि उसकी नींव कितनी कमजोर है। उस हर पल यह चिंता रहेगी कि यह कभी भी ढह सकता है। अनैतिक रूप से कमाया गया पैसा या पद प्रतिष्ठा यह सब इंसान को सुख तो दे सकती है, लेकिन मन की शांति नहीं।
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