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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 27, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Budhwar Ke Upay: इस स्तोत्र के पाठ के बिना अधूरी है बुधवार की पूजा, बरसेगी विघ्नहर्ता की कृपा

    Updated: Wed, 27 Nov 2024 07:00 AM (IST)

    सनातन धर्म में सप्ताह के दिन सभी दिन अलग-अलग देवी-देवता की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित हैं। ठीक इसी प्रकार बुधवार का दिन भगवान शिव के पुत्र गणपति बप्पा ...और पढ़ें

    Budhwar Ke Upay: इस स्तोत्र के पाठ के बिना अधूरी है बुधवार की पूजा, (Pic Credit-Freepik)
    Budhwar Ke Upay: इस स्तोत्र के पाठ के बिना अधूरी है बुधवार की पूजा, (Pic Credit-Freepik)

    HighLights

    1. बुधवार के दिन भगवान गणेश की पूजा होती है।
    2. गणपति बप्पा को विघ्नहर्ता कहा जाता है।
    3. इस दिन पूजा करने से कारोबार में सफलता मिलती है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अगर आप किसी कार्य में बाधा का सामना कर रहे हैं, तो बुधवार के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करें। साथ ही गणेश जी की मोदक और मिठाई समेत आदि चीजों का भोग लगाएं। इसके अलावा आरती करने के बाद श्री गणपति स्तोत्र का पाठ करें। ऐसी मान्यता है कि बुधवार के दिन इन कार्यों को करने से जातक को सभी कार्य में सफलता प्राप्त होगी और रुके हुए काम पूरे होंगे। आइए पढ़ते हैं श्री गणपति स्तोत्र।

    ॥ श्री गणपति स्तोत्र॥

    जेतुं यस्त्रिपुरं हरेणहरिणा व्याजाद्बलिं बध्नता

    स्रष्टुं वारिभवोद्भवेनभुवनं शेषेण धर्तुं धराम्।

    पार्वत्या महिषासुरप्रमथनेसिद्धाधिपैः सिद्धये

    ध्यातः पञ्चशरेण विश्वजितयेपायात्स नागाननः॥

    विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणि-र्विघ्नाटवीहव्यवाड्

    विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडोविघ्नेभपञ्चाननः।

    विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रभेदन-पविर्विघ्नाम्बुधेर्वाडवो

    विघ्नाघौधघनप्रचण्डपवनोविघ्नेश्वरः पातु नः॥

    खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनंलम्बोदरं सुन्दरं

    प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धम-धुपव्यालोलगण्डस्थलम्।

    दन्ताघातविदारितारिरुधिरैःसिन्दूरशोभाकरं

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    वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिंसिद्धिप्रदं कामदम्॥

    गजाननाय महसेप्रत्यूहतिमिरच्छिदे।

    अपारकरुणा-पूरतरङ्गितदृशे नमः॥

    अगजाननपद्मार्कंगजाननमहर्निशम्।

    अनेकदन्तं भक्तानामेक-दन्तमुपास्महे॥

    श्वेताङ्गं श्वेतवस्त्रं सितकु-सुमगणैः पूजितं श्वेतगन्धैः

    क्षीराब्धौ रत्नदीपैः सुरनर-तिलकं रत्नसिंहासनस्थम्।

    दोर्भिः पाशाङ्कुशाब्जा-भयवरमनसं चन्द्रमौलिं त्रिनेत्रं

    ध्यायेच्छान्त्यर्थमीशं गणपति-ममलं श्रीसमेतं प्रसन्नम्॥

    आवाहये तं गणराजदेवंरक्तोत्पलाभासमशेषवन्द्यम्।

    विघ्नान्तकं विघ्नहरं गणेशंभजामि रौद्रं सहितं च सिद्धया॥

    यं ब्रह्म वेदान्तविदो वदन्तिपरं प्रधानं पुरुषं तथान्ये।

    विश्वोद्गतेः कारणमीश्वरं वातस्मै नमो विघ्नविनाशनाय॥

    विघ्नेश वीर्याणि विचित्रकाणिवन्दीजनैर्मागधकैः स्मृतानि।

    श्रुत्वा समुत्तिष्ठ गजानन त्वंब्राह्मे जगन्मङ्गलकं कुरुष्व॥

    गणेश हेरम्ब गजाननेतिमहोदर स्वानुभवप्रकाशिन्।

    वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथवदन्त एवं त्यजत प्रभीतीः॥

    अनेकविघ्नान्तक वक्रतुण्डस्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति।

    कवीश देवान्तकनाशकारिन्वदन्त एवं त्यजत प्रभीतीः॥

    अनन्तचिद्रूपमयं गणेशंह्यभेदभेदादिविहीनमाद्यम्।

    हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थंतमेकदन्तं शरणम् व्रजामः॥

    विश्वादिभूतं हृदि योगिनां वैप्रत्यक्षरूपेण विभान्तमेकम्।

    सदा निरालम्बसमाधिगम्यंतमेकदन्तं शरणम् व्रजामः॥

    यदीयवीर्येण समर्थभूता मायातया संरचितं च विश्वम्।

    नागात्मकं ह्यात्मतया प्रतीतंतमेकदन्तं शरणम् व्रजामः॥

    सर्वान्तरे संस्थितमेकमूढंयदाज्ञया सर्वमिदं विभाति।

    अनन्तरूपं हृदि बोधकं वैतमेकदन्तं शरणम् व्रजामः॥

    यं योगिनो योगबलेन साध्यंकुर्वन्ति तं कः स्तवनेन नौति।

    अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तुतमेकदन्तं शरणम् व्रजामः॥

    देवेन्द्रमौलिमन्दार-मकरन्दकणारुणाः।

    विघ्नान् हरन्तुहेरम्बचरणाम्बुजरेणवः॥

    एकदन्तं महाकायंलम्बोदरगजाननम्।

    विघ्ननाशकरं देवंहेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

    यदक्षरं पदं भ्रष्टंमात्राहीनं च यद्भवेत्।

    तत्सर्वं क्षम्यतां देवप्रसीद परमेश्वर॥

    ॥ इति श्रीगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

    भगवान गणेश के मंत्र

    1. महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

    गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

    2. ॐ ग्लौम गौरी पुत्र, वक्रतुंड, गणपति गुरु गणेश।

    ग्लौम गणपति, ऋद्धि पति, सिद्धि पति. करो दूर क्लेश ।।

    3. गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

    श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥

    4.ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते

    वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा'

    5. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गण्पत्ये वर वरदे नमः

    ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात”

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