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    Shiv Puja: भगवान शिव की पूजा के समय करें इस चालीसा का पाठ, दूर होगी हर परेशानी

    Updated: Sun, 01 Mar 2026 10:00 PM (IST)

    फाल्गुन माह के अंतिम सोमवार को भगवान शिव और मां पार्वती की भक्ति भाव से पूजा की जाएगी। इस दिन व्रत रखने से साधकों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ...और पढ़ें

    Shiv Puja: भगवान शिव को कैसे प्रसन्न करें?

    Shiv Puja: भगवान शिव को कैसे प्रसन्न करें?

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, 02 मार्च को फाल्गुन माह का अंतिम सोमवार है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव और मां पार्वती की भक्ति भाव से पूजा की जाएगी। साथ ही मनचाही मुराद पाने के लिए साधक सोमवार का व्रत रखेंगे। इस व्रत को करने से साधक के सकल मनोरथ शिवजी की कृपा से पूरे हो जाते हैं।

    shiv ji

    अगर आप भी भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा के भागी बनना चाहते हैं, तो फाल्गुन माह के अंतिम सोमवार पर स्नान-ध्यान के बाद भक्ति भाव से शिव-शक्ति की पूजा करें। पूजा के समय गंगाजल या दूध से देवों के देव महादेव का अभिषेक करें। वहीं, पूजा के समय शिव चालीसा और शिव तांडव का पाठ करें और पूजा का समापन शिव आरती से करें।

    शिव तांडव स्त्रोतम

    जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।

    डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥

    जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।

    धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥

    धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।

    कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥

    जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।

    मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥

    सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।

    भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥

    ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।

    सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥

    करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।

    धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥

    नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।

    निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥

    प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।

    स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥

    अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।

    स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥

    जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।

    धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥

    दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।

    तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥

    कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

    विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥

    इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

    हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥

    पार्वती चालीसा

    ॥ दोहा ॥

    जय गिरी तनये दक्षजे,शम्भु प्रिये गुणखानि।
    गणपति जननी पार्वती,अम्बे! शक्ति! भवानि॥

    ॥ चौपाई ॥

    ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे। पंच बदन नित तुमको ध्यावे॥
    षड्मुख कहि न सकत यश तेरो। सहसबदन श्रम करत घनेरो॥
    तेऊ पार न पावत माता। स्थित रक्षा लय हित सजाता॥
    अधर प्रवाल सदृश अरुणारे। अति कमनीय नयन कजरारे॥
    ललित ललाट विलेपित केशर। कुंकुम अक्षत शोभा मनहर॥
    कनक बसन कंचुकी सजाए। कटी मेखला दिव्य लहराए॥
    कण्ठ मदार हार की शोभा। जाहि देखि सहजहि मन लोभा॥
    बालारुण अनन्त छबि धारी। आभूषण की शोभा प्यारी॥
    नाना रत्न जटित सिंहासन। तापर राजति हरि चतुरानन॥
    इन्द्रादिक परिवार पूजित। जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥
    गिर कैलास निवासिनी जय जय। कोटिक प्रभा विकासिन जय जय॥
    त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी। अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥
    हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे। त्रिभुवन के जो नित रखवारे॥
    उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब। सुकृत पुरातन उदित भए तब॥
    बूढ़ा बैल सवारी जिनकी। महिमा का गावे कोउ तिनकी॥
    सदा श्मशान बिहारी शंकर। आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥
    कण्ठ हलाहल को छबि छायी। नीलकण्ठ की पदवी पायी॥
    देव मगन के हित अस कीन्हों। विष लै आपु तिनहि अमि दीन्हों॥
    ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि। दूरित विदारिणी मंगल कारिणि॥
    देखि परम सौन्दर्य तिहारो। त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥
    भय भीता सो माता गंगा। लज्जा मय है सलिल तरंगा॥
    सौत समान शम्भु पहआयी। विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥
    तेहिकों कमल बदन मुरझायो। लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो॥
    नित्यानन्द करी बरदायिनी। अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥
    अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि। माहेश्वरी हिमालय नन्दिनि॥
    काशी पुरी सदा मन भायी। सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥
    भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री। कृपा प्रमोद सनेह विधात्री॥
    रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे। वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥
    गौरी उमा शंकरी काली। अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली॥
    सब जन की ईश्वरी भगवती। पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥
    तुमने कठिन तपस्या कीनी। नारद सों जब शिक्षा लीनी॥
    अन्न न नीर न वायु अहारा। अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥
    पत्र घास को खाद्य न भायउ। उमा नाम तब तुमने पायउ॥
    तप बिलोकि रिषि सात पधारे। लगे डिगावन डिगी न हारे॥
    तब तव जय जय जय उच्चारेउ। सप्तरिषि निज गेह सिधारेउ॥
    सुर विधि विष्णु पास तब आए। वर देने के वचन सुनाए॥
    मांगे उमा वर पति तुम तिनसों। चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों॥
    एवमस्तु कहि ते दोऊ गए। सुफल मनोरथ तुमने लए॥
    करि विवाह शिव सों हे भामा। पुनः कहाई हर की बामा॥
    जो पढ़िहै जन यह चालीसा। धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥

    ॥ दोहा ॥
    कूट चन्द्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खानि।
    पार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि॥

    शिव जी की आरती

    ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
    ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
    हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे ।
    त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।
    चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
    सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी।
    सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
    प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

    त्रिगुणस्वामी जी की आरति, जो कोइ नर गावे।
    कहत शिवानंद स्वाम, सुख संपति पावे ॥
    ॐ जय शिव ओंकारा...

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