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    Shiv Apradh Kshamapan Stotra: महादेव से चाहिए क्षमा? आज ही शुरू करें शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ

    Updated: Fri, 06 Mar 2026 06:50 PM (IST)

    क्या आप जानते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य रचित शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र (Shiv Apradh Kshamapan Stotra) के पाठ से जीवन के हर पड़ाव की गलतियां माफ हो जा ...और पढ़ें

    Shiv Apradh Kshamapan Stotra: शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र (Image Source: AI-Generated)

    Shiv Apradh Kshamapan Stotra: शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। भगवान शिव (Lord Shiva) को 'भोलेनाथ' कहा जाता है क्योंकि वे बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन, अनजाने में किए गए अपराधों या पूजा-पाठ में हुई गलतियों के लिए माफी मांगना भी हमारी आध्यात्मिक यात्रा का अहम हिस्सा है। इसके लिए 'शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र' को सबसे शक्तिशाली माध्यम माना गया है।

    क्या है शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र?

    यह स्तोत्र आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसमें मनुष्य अपने जीवन के हर पड़ाव (बचपन, युवावस्था और बुढ़ापा) में किए गए पापों के लिए महादेव से क्षमा याचना करता है। अक्सर हम अपनी व्यस्त जीवनशैली में जाने-अनजाने ऐसे काम कर बैठते हैं जो धर्म के विरुद्ध होते हैं, या फिर पूजा के दौरान विधि-विधान में कमी रह जाती है।

    शिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् (shiv apradh kshamapan stotra)

    आदौ कर्मप्रसङ्गात् कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां,
    विण्मूत्रामेध्यमध्ये क्वथयति नितरां जाठरो जातवेदाः ।

    यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वक्तुम्,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ १ ॥

    बाल्ये दुःखातिरेकान् मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा,
    नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति ।

    नानारोगादिदुःखा-द्रुदनपरवशः शंकरं न स्मरामि,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ २॥

    प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ,
    दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादसौख्ये निषण्णः ।

    Shiv storra

    (Image Source: AI-Generated)

    शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ३॥

    वार्द्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादिऽऽतापैः,
    पापै रोगैर्वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम्।

    मिथ्यामोहाभिलाषैभ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥४॥

    नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहन-प्रत्यवायाकुलाख्यं,
    श्रौते वार्ता कथं मे द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गे सुसारे।

    ज्ञातो धर्मो विचारैः श्रवणमननयोः किं निदिध्यासितव्यं,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ।। ५ ।।

    स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधौ नाहृतं गांगतोयं,
    पूजार्थं वा कदाचिद् बहुतरगहनात्खण्ड -बिल्वीदलानि।

    नाऽऽनीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पैस्त्वदर्थं,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ६ ॥

    दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तैर्दधिसितसहितैः स्नापितं नैव लिंगं,
    नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितैः पूजितं न प्रसूनैः ।

    धूपैः कर्पूरदीपैर्विविधरसयुतैर्नैव भक्ष्योपहारैः,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ७॥

    ध्यात्वा चित्ते शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो,
    हव्यं ते लक्षसंख्यैहुतवहवदने नार्पितं बीजमन्त्रैः ।

    नो तप्तं गाङ्गतीरे व्रतजपनियमै रुद्रजाप्यैर्न वेदैः,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥८॥

    स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुण्डले सूक्षममार्गे,
    शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकटितविभवे ज्योतिरूपेऽपराख्ये।

    लिंगज्ञे ब्रह्मवाक्ये सकलतनुगतं शंकरं न स्मरामि,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ९ ॥

    नग्नो निःसंगशुद्धस्त्रिगुणविरहितो ध्वस्तमोहान्धकारो,
    नासाग्रे न्यस्तदृष्टिर्विदितभवगुणो नैव दृष्टः कदाचित् ।

    उन्मन्याऽवस्थया त्वां विगतकलिमलं शंकरं न स्मरामि,
    क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ १० ॥

    चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शङ्करे,
    सर्वैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे।

    दन्तित्वक्कृतसुन्दराम्बरधरे त्रैलोक्यसारे हरे,
    मोक्षार्थं कुरु चित्तवृत्तिमखिलामन्यैस्तु किं कर्मभिः ॥ ११ ॥

    किं वाऽनेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं,
    किं वा पुत्रकलत्रमित्र- पशुभिर्देहेन गेहेन किम्। ज्ञात्वैतत्क्षणभंगुरं सपदि रे।

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