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    Bhalchandra Chaturthi पर पूजा के समय करें इस खास स्तोत्र का पाठ, पैसों की तंगी से मिलेगी मुक्ति

    Updated: Thu, 05 Mar 2026 05:30 PM (IST)

    वैदिक पंचांग के अनुसार, 6 मार्च को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी है, जो चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। ...और पढ़ें

    Bhalchandra Chaturthi पर क्या करें और क्या न करें?

    Bhalchandra Chaturthi पर क्या करें और क्या न करें?

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, 06 मार्च को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी है। यह पर्व हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही मनचाही मुराद पाने एवं शुभ कामों में सफलता और सिद्धि पाने के लिए उनके निमित्त व्रत रखा जाता है।

    ganesh ji

    भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सुख-सौभाग्य और वंश में वृद्धि होती है। साथ ही आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलती है। अगर आप भी करियर और कारोबार में विशेष सफलता पाना चाहते हैं, तो भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी पर भक्ति भाव से भगवान गणेश की पूजा करें। साथ ही पूजा के समय ऋणहर्ता श्री गणेश स्तोत्र का पाठ करें।

    गणेश मंत्र

    1. गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः ।
    द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः ॥
    विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः ।
    द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌ ॥
    विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत्‌ क्वचित्‌ ।

    2. दन्ताभये चक्रवरौ दधानं, कराग्रगं स्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
    धृताब्जयालिङ्गितमाब्धि पुत्र्या-लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे॥

    3. शृणु पुत्र महाभाग योगशान्तिप्रदायकम् ।
    येन त्वं सर्वयोगज्ञो ब्रह्मभूतो भविष्यसि ॥

    चित्तं पञ्चविधं प्रोक्तं क्षिप्तं मूढं महामते ।
    विक्षिप्तं च तथैकाग्रं निरोधं भूमिसज्ञकम् ॥

    तत्र प्रकाशकर्ताऽसौ चिन्तामणिहृदि स्थितः ।
    साक्षाद्योगेश योगेज्ञैर्लभ्यते भूमिनाशनात् ॥

    चित्तरूपा स्वयंबुद्धिश्चित्तभ्रान्तिकरी मता ।
    सिद्धिर्माया गणेशस्य मायाखेलक उच्यते ॥

    अतो गणेशमन्त्रेण गणेशं भज पुत्रक ।
    तेन त्वं ब्रह्मभूतस्तं शन्तियोगमवापस्यसि ॥

    इत्युक्त्वा गणराजस्य ददौ मन्त्रं तथारुणिः ।
    एकाक्षरं स्वपुत्राय ध्यनादिभ्यः सुसंयुतम् ॥

    तेन तं साधयति स्म गणेशं सर्वसिद्धिदम् ।
    क्रमेण शान्तिमापन्नो योगिवन्द्योऽभवत्ततः ॥

    4. ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ ।
    निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा ॥

    5. विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लंबोदराय सकलाय जगद्धितायं।
    नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते।।

    ऋणहर्ता श्री गणेश स्तोत्र

    सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजितः फलसिद्धये।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    त्रिपुरस्य वधात्पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    हिरण्यकश्यपादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    तारकस्य वधात्पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    भास्करेण गणेशस्तु पूजितश्छविसिद्धये।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    शशिना कान्तिसिद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    पालनाय च तपसा विश्वामित्रेण पूजितः।
    सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे॥
    इदं त्वृणहरं स्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम्।
    एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः॥
    दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेरसमतां व्रजेत्।
    फडन्तोऽयं महामन्त्रः सार्धपञ्चदशाक्षरः॥
    अस्यैवायुतसंख्याभिः पुरश्चरणमीरितम।
    सहस्रावर्तनात् सद्यो वाञ्छितं लभते फलम्॥
    भूत-प्रेत-पिशाचानां नाशनं स्मृतिमात्रतः॥

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    ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्र

    ॐ स्मरामि देवदेवेशंवक्रतुण्डं महाबलम्।
    षडक्षरं कृपासिन्धुंनमामि ऋणमुक्तये॥
    महागणपतिं वन्देमहासेतुं महाबलम्।
    एकमेवाद्वितीयं तुनमामि ऋणमुक्तये॥
    एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकंब्रह्म सनातनम्।
    महाविघ्नहरं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥
    शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णंशुक्लगन्धानुलेपनम्।
    सर्वशुक्लमयं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥
    रक्ताम्बरं रक्तवर्णंरक्तगन्धानुलेपनम्।
    रक्तपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
    कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णंकृष्णगन्धानुलेपनम्।
    कृष्णयज्ञोपवीतं चनमामि ऋणमुक्तये॥
    पीताम्बरं पीतवर्णपीतगन्धानुलेपनम्।
    पीतपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
    सर्वात्मकं सर्ववर्णंसर्वगन्धानुलेपनम्।
    सर्वपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
    एतद् ऋणहरं स्तोत्रंत्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
    षण्मासाभ्यन्तरे तस्यऋणच्छेदो न संशयः॥
    सहस्रदशकं कृत्वाऋणमुक्तो धनी भवेत्॥

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