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    Shiv Chalisa Path: सिर्फ 40 दिन करें शिव चालीसा का छोटा सा पाठ, मौत के मुंह से खींच लाते हैं महादेव

    Updated: Sat, 14 Mar 2026 08:45 AM (IST)

    शिव चालीसा का महत्व और इसके चमत्कारी लाभ। जानें कैसे मात्र 40 पंक्तियों का यह पाठ आपके जीवन से दरिद्रता और डर को हमेशा के लिए खत्म कर सकता है। ...और पढ़ें

    Shiv Chalisa Path: शिव चालीसा का पाठ (Image Source: Freepik)

    Shiv Chalisa Path: शिव चालीसा का पाठ (Image Source: Freepik)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। भगवान शिव, जिन्हें हम प्यार से भोलेनाथ कहते हैं, उनकी भक्ति के अनेक मार्ग हैं। कोई कठोर तपस्या करता है, कोई उपवास रखता है, तो कोई केवल 'ओम नमः शिवाय' (Om Namah Shivay) के जप से उन्हें प्रसन्न कर लेता है।

    लेकिन, इन सबके बीच 'शिव चालीसा' (Shiv Chalisa) एक ऐसा सरल और शक्तिशाली माध्यम है, जिसे हर आम इंसान आसानी से अपना सकता है।

    पाठ करने के लाभ

    •  अगर आपको किसी अनजान भय या मानसिक तनाव ने घेर रखा है, तो नियमित रूप से शिव चालीसा का पाठ आपके भीतर साहस पैदा करता है।
    •  घर में अगर हमेशा कलह रहती हो, तो कपूर जलाकर शिव चालीसा का पाठ (Shiv Chalisa Ka Path) करने से घर की ऊर्जा सकारात्मक हो जाती है।
    •  ऐसी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति 40 दिनों तक ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पूरी श्रद्धा से इसे पढ़ता है, तो उसकी अधूरी इच्छाएं महादेव की कृपा से पूरी होने लगती हैं।
    •  इसके शब्दों में इतनी शक्ति है कि यह इंसान को अनजाने में हुई गलतियों के अपराधबोध से मुक्त कर उसे सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है।

    सही तरीका क्या है?

    वैसे तो महादेव भाव के भूखे हैं, आप कभी भी उन्हें याद कर सकते हैं। लेकिन, अगर सुबह स्नान के बाद, सफेद कपड़े पहनकर और सामने दीया जलाकर इसका पाठ किया जाए, तो एकाग्रता बढ़ती है। पाठ के बाद महादेव से अपनी गलतियों की क्षमा मांगना और सबका भला चाहना सबसे जरूरी है।

    Shiv ji

    (Image Source: Freepik)

    शिव चालीसा

    ।।दोहा।।

    श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

    कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान।।

    ।।चौपाई।।

    जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत संतन प्रतिपाला।।

    भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुंडल नागफनी के।।

    अंग गौर शिर गंग बहाये। मुंडमाल तन छार लगाये।।

    वस्त्र खाल बाघंबर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे।।

    मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी।।

    कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी।।

    नंदि गणेश सोहै तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे।।

    कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ।।

    देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा।।

    किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी।।

    तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महं मारि गिरायउ।।

    आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा।।

    त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई।।

    किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी।।

    दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं।।

    वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई।।

    प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला।।

    कीन्ह दया तहं करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई।।

    पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा।।

    सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी।।

    एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई।।

    कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर।।

    जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी।।

    दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै।।

    त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो।।

    लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो।।

    मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई।।

    स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी।।

    धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं।।

    अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी।।

    शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन।।

    योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं।।

    नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय।।

    जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शंभु सहाई।।

    ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी।।

    पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई।।

    पंडित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ।।

    त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा।।

    धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे।।

    जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे।।

    कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी।।

    ।।दोहा।।

    नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।

    तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश।।

    मगसर छठि हेमंत ॠतु, संवत चौसठ जान।

    अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण।।

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