हनुमान से लेकर जटायु तक: प्रभु श्री राम के 10 करीबी सहयोगी, जिनके बिना अधूरी थी रावण पर जीत
रामायण में रावण पर विजय सिर्फ श्री राम की नहीं, बल्कि उनके 10 वफादार सहयोगियों की एकता का परिणाम थी। हनुमान, लक्ष्मण, विभीषण और जटायु जैसे साथियों ने ...और पढ़ें

रामायणकाल में प्रभु श्री राम के सबसे करीबी साथी

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण को याद करते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले रावण पर मिली जीत याद आती है, लेकिन बुराई पर अच्छाई की जीत के पीछे श्री राम जी के अलावा उनके वफादार साथियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी।
जहां प्रभु हनुमान की बेमिसाल भक्ति और भाई लक्ष्मण की अटूट वफादारी से लेकर जटायु के परम बलिदान और भरत के निस्वार्थ प्यार तक, इन लोगों ने साबित किया कि असली महानता अकेले कार्य करने में नहीं, बल्कि एकता के साथ कार्य करने में है। आइए जानते हैं प्रभु श्री राम के 10 करीबी सहयोगी जिन्होंने रामायणकाल में अहम भूमिका अदा की थी।
विभीषण
विभीषण ने रावण के प्रति वफादारी दिखाने के बजाय धर्म के रास्ते को चुना। उन्होंने प्रभु श्री राम को लंका और उसके पराक्रमी योद्धाओं के बारे में जानकारी दी। विभीषण के मार्गदर्शन में रावण के सभी भेद खुल गए। बाद में श्री राम ने सम्मान और विश्वास के साथ उन्हें लंका का राजा घोषित किया।
निषादराज गुहा
निषादराज वनवास के दौरान प्रभु श्री राम के सबसे शुरुआती और सबसे वफादार दोस्तों में से एक थे। उन्होंने प्रभु श्री राम का स्वागत करने के साथ उनकी मदद की और सदैव उनकी भक्ति में रत रहे। प्रभु श्री राम और निषादराज की दोस्ती अटूट रिश्ते का प्रतीक है।
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अंगद
अंगद वानरों के राजा बाली का बेटा और श्री राम की सेना का अत्यंत बहादुर और निडर योद्धाओं में से एक था, जिसने अपने पिता और चाचा सुग्रीव के झगड़े के बावजूद राम की भक्ति को चुना। लंका युद्ध के दौरान उनकी हिम्मत और लीडरशिप ने श्री राम की सेना को मजबूत करने का काम किया था। अंगद भी प्रभु श्री राम के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं।
जाम्बवन्त
जाम्बवन्त श्री राम की सेना के सबसे बुद्धिमान बुजुर्ग भालू थे। रामायणकाल में उनके अनुभव और समझदारी ने कई अहम फैसलों में मुख्य भूमिका अदा की थी। उन्होंने हनुमान जी को अपनी शक्तियों का रहस्य समझाया। उनकी समझदारी प्रभु श्री राम के मिशन के लिए काफी जरूरी मानी जाती है।
सुग्रीव
सुग्रीव वानरों के राजा थे, जिसने माता सीता की खोज में प्रभु श्री राम की काफी मदद की थी। उनके गठबंधन ने श्री राम को लंका को चुनौती देने के लिए वानरों की सेना दी। प्रभु श्री राम और सुग्रीव जी ने मिलकर लंका में राक्षसों की सेना को हराया। उनकी दोस्ती ने इतिहास की दिशा बदल दी।
जटायु
जटायु श्री राम के सबसे वफादार साथियों और शुभचिंतकों में से शामिल थे। बूढ़े होने के बाद भी उन्होंने मां सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की रक्षा किए बिना ही रावण से लड़ाई लड़ी। यह जानते हुए भी कि वह जीत नहीं सकते, उन्होंने सुरक्षा के बजाय लड़ना चुना। उनका बलिदान हमेशा सम्मान के लायक है। श्री राम भी उनके शुभचिंतक थे।
भरत
भ्राता भरत ने उस राजगद्दी को लेने से मना कर दिया, जो असल में प्रभु श्री राम की थी। उन्होंने पूरे वनवास के दौरान अयोध्या में सिर्फ श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में राज किया। उनकी वफादारी और अमूल्य प्रेम भारतीय पौराणिक कथाओं में सबसे महान है। वे दूर रहकर भी प्रभु श्री राम के पक्के समर्थक रहे।
सीता मां
प्रभु श्री राम की यात्रा में सबसे अहम योगदान मां सीता ने निभाया था। मां सीता का साहस, त्याग और अटूट विश्वास जिसने रामायण को आकार दिया। श्री राम और मां सीता ने मिलकर धर्म और आदर्श का साथ निभाया। उनका रिश्ता अनंतकाल तक अमर है।
हनुमान
भगवान श्री राम के परम भक्त और भरोसेमंद साथियों में हनुमान जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हनुमान जी ने समुद्र पार किया, मां सीता को खोजा और युद्ध में अहम भूमिका अदा की। उनकी भक्ति, साहस और विनम्रता अकल्पनीय है। हनुमान जी के रोम-रोम में प्रभु श्री राम और मां सीता का वास है।
लक्ष्मण
लक्ष्मण भाई से कहीं ज्यादा थे, वे श्री राम के हमेशा साथ रहे। उन्होंने अपनी मर्जी से ही शाही राज का सुख छोड़ा और भाईया-भाभी के साथ वनवास में चले गए। मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में वे मजबूती से प्रभु राम के साथ खड़े रहे। उनकी वफादारी आज भी अमर है।
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