9 लाख जलचर, 20 लाख पेड़... तो इंसान कितने? पद्म पुराण में दर्ज 84 लाख योनियों का अद्भुत गणित
हिंदू धर्म में 84 लाख योनियों का रहस्य क्या है और पद्म पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में इसे लेकर क्या कहा गया है? आइए समझते हैं। ...और पढ़ें

84 लाख योनियों का रहस्य क्या है? (Picture Credits- AI Image)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमनें कभी न कभी यह जरूर सुना होगा कि, मनुष्य योनि में जन्म लेने के लिए 84 लाख योनियों से गुजरना पड़ता है। हिंदू धर्म से जुड़े पद्म पुराण में 84 लाख योनियों का जिक्र देखने को मिलता है और इन योनियों में से मनुष्य की योनि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
पद्म पुराण ही नहीं गरुड़ पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी इसका वर्णन देखने को मिलता है। आइए आसान भाषा में जानते हैं 84 लाख योनियों का रहस्य क्या है?
84 लाख योनियों दो हिस्सों में वर्गीकृत
अलग-अलग पुराणों में 84 लाख योनियों के बारे में अलग बताया गया है। हिंदू धर्म से जुड़े आचार्यों ने 84 लाख योनियों को दो भागों में वर्गीकृत किया है। पहलायोनिज और दूसरा आयोनिज मतलब 2 जीवों के संयोग से पैदा हुआ प्राणी योनिज और जो अपने आप अमीबा से विकसित हुआ है, उसे आयोनिज कहा गया है। इसके अलावा जीवों को 3 अतिरिक्त भागों में बांटा गया है।
- जलचर- पानी में रहने वाले जीव
- थलचर- पृथ्वी पर रेंगने वाले जीव
- नभचर- आकाश में उड़ने वाले सभी जीव
पद्म पुराण में 84 लाख योनियों का रहस्य?
पद्म पुराण के अध्याय 78 में साफ-साफ लिखा है कि-
"जलज नव लक्षाणि, स्थावर लक्ष-विंशति, कृमयो रुद्र-संख्यकः, पक्षिणाम् दश-लक्षणम्। त्रिंशल्लक्षाणि पशवः, चतुर्लक्षाणि मानवाः ॥"
अर्थात्- जलचर प्राणी 9 लाख, स्थावर यानी पेड़ पौधे 20 लाख, सांप और कीड़े-मकौड़े 11 लाख, पक्षी 10 लाख, स्थलीय जीव 30 लाख और शेष 4 लाख मानव नस्ल जो कुल 84 लाख बनते हैं।
इस ब्रह्मांड में मनुष्यों, जानवरों और देवी-देवताओं के अलावा भी कुछ न दिखाई देने वाले जीव या शक्तियां होती हैं। ये हमारी सामान्य दुनिया से अलग एक दूसरी दुनिया में रहते हैं, जिन्हें हम अपनी आंखों से नहीं देख सकते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों, पद्म पुराण और भागवत पुराण में इनके बारे में विस्तार से बताया गया है।
84 लाख योनियों में से मनुष्य योनि कब मिलती है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, एक आत्मा को कर्मों के परिणाम स्वरूप 30 लाख बार पेड़ की योनि मिलती है। उसके बाद प्राणियों के रूप में 9 लाख बार, कीड़े-मकौड़े की योनि में 10 लाख बार जन्म और फिर 11 लाख बार पक्षी की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
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उसके बाद 20 लाख बार जानवरों की योनि में जन्म होता है और आखिर में कर्म के अनुसार गाय का शरीर मिलता है और तब 4 लाख बार मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद पितृ या देव योनि की प्राप्ति होती है। यह सभी कर्म के अनुसार चलता है।

पिछले जन्म के कर्मों से आत्मा की गति तय
हिंदू शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि, पिछले जन्म के कर्मों के हिसाब से आत्मा की गति तय होती है। अगर किसी व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में अधिक पुण्य किया हो, तो आत्मा को देव योनि, मनुष्य योनि या फिर उन्नत योनि में जन्म मिलता है। लेकिन जीवन में पाप कर्म अधिक हैं, तो आत्मा को पशु, कीट, नरक जैसी नीच योनी में जन्म लेने पड़ता है।
हिंद धर्म में मनुष्य की योनि को मोक्ष का द्वार भी कहा जाता है। मनुष तनु दुर्लभम अर्थात् यह शरीर मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र जरिया है। मनुष्य योनि का इस्तेमाल अगर ईश्वर की भक्ति, सेवा, सच और धर्म के लिए नहीं किया जाए तो आत्मा फिर से चौरासी लाख योनियों का सफर तय करती है। इसलिए ये जरूरी है कि, मनुष्य जन्म बेकार न जाए क्योंकि यह न सिर्फ दुर्लभ है, बल्कि अन्य योनियों में आत्मा केवल भोग करती है, जबकि सिर्फ मनुष्य योनि में विवेक और मुक्ति की क्षमता होती है।
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