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    सिर्फ सुंदरता ही नहीं, इन अद्भुत और चमत्कारी रहस्यों के स्वामी भी हैं भगवान कार्तिकेय

    Updated: Tue, 02 Jun 2026 02:00 PM (IST)

    भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र भगवान कार्तिकेय के रोचक तथ्यों को जानें। इसमें उनके विभिन्न नाम, तारकासुर वध की कहानी, छह मुखों का रहस्य और उन ...और पढ़ें

    भगवान कार्तिकेय से जुड़ी रोचक तथ्य! (AI-Generated Image)

    भगवान कार्तिकेय से जुड़ी रोचक तथ्य! (AI-Generated Image)  

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र भगवान कार्तिकेय को स्वामिनाथ, मुरुगन, मुरुगा, कुमार, स्कंद, शनमुख जैसे कई नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में प्रचलित सुब्रमण्यम नाम से भी भगवान कार्तिकेय का प्रसिद्ध मंदिर है। वे हिंदू धर्म के लोकप्रिय देवताओं के साथ भगवान गणेश के बड़े भाई भी हैं।

    तमिलनाडु और भारत के कुछ खास जगहों को छोड़कर भगवान कार्तिकेय भारत के अन्य हिस्सों में अपने भाई भगवान गणेश की तरह लोकप्रिय नहीं हैं। फिर भी, वे कई दिव्य गुणों से सुशोभित और अत्यंत शक्तिशाली देवता हैं। आइए जानते हैं भगवान कार्तिकेय से जुड़े रोचक तथ्यों के बारे में।

    भगवान कार्तिकेय आकर्षक देवता

    भगवान कार्तिकेय अत्यंत सुंदर और आकर्षक देवताओं में से एक हैं। अपने हंसमुख और गोल-मटोल भाई गणेश के विपरीत उन्हें पौराणिक ग्रंथों में अक्सर एक शांत और सौम्य चेहरे वाला देवता बताया जाता है।

    शांत और सौम्य स्वभाव के रूप में उनका चेहरा पूर्णिमा के चांद की तरह चमकता है, इसलिए कई माता-पिता अपने बच्चे का नाम कार्तिकेय रखते हैं, इस उम्मीद में कि उनका बेटा काफी सुंदर बनेगा।

    भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का किया वध

    तारकासुर का अंत

    भगवान ब्रह्म ने तारकासुर नामक एक असुर वरदान दिया था कि, उसे सिर्फ भगवान शिव के समान बलवान ही मार सकता है। भगवान शिव का पुत्र कार्तिकेय भी उन्हीं के समान शक्तिशाली होगा। सती की मृत्यु के कुछ समय बाद ही तारकासुर ने यह मान लिया कि शिव दुखी और निराश हैं और दुबारा विवाह नहीं करेंगे। आखिर में बिना पत्नी के उनका कोई पुत्र भी नहीं होगा। हालांकि ऐसा माना जाता है कि, भगवान मुरुगन ने तारकासुर का अंत करने के एकमात्र उद्देश्य से ही अवतार लिया था।

    भगवान शिव ने माता सती की मृत्यु के बाद देवी पार्वती से विवाह किया। भगवान शिव उन्हें एक गुफा में ले गए और उनसे ध्यान करने को कहा। जब वे दोनों ध्यान कर रहे थे, तभी उनकी ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं से आग का एक गोला प्रकट हुआ।

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    इसी बीच तारकासुर के आतंक से भयभीत महसूस कर रहे अन्य देवताओं ने अग्नि देव को अग्नि के गोले को पकड़ने के लिए भेजा। लेकिन शिव और माता पार्वती की ऊर्जा की ऊष्मा अग्नि देव भी सहन नहीं कर पाए। इसलिए उन्होंने गोला देवी गंगा को सौंप दिया। जब मां गंगा भी उस उष्म को सहन कर पाने में असक्षम हुई, तो उन्होंने अग्नि के गोले को सरकंडों के जंगल में स्थित एक झील में विसर्जित कर दिया।

    भगवान कार्तिकेय शनमुख देवता

    भगवान कार्तिकेय को शनमुख या 6 मुखों वाले भगवान के रूप में भी जाना जाता है। भगवान शिव अपनी प्रचंड बीच अग्नि को सौंप देते हैं, जो तब तक उसे संभालती है जब तक कि वह प्रकाश शिव की संतान रूप न ले ले। ताप सहन न कर पाने के वजह से अग्नि वह प्रकाश गंगा को सौंप देती है। तब देवी पार्वती ने इस जलधारा का रूप धारण किया क्योंकि सिर्फ वही शिव और शक्ति की ऊर्जा को सहन करने में पाने में सक्षम थीं।

    आखिर में अग्नि गोले ने 6 मुखों वाले एक शिशु का रूप धारण कर लिया, ईसनम, सत्पुरुषम, वामदेवम, अगोरम, सत्योजथम और अधोमुगम और इसीलिए उनका नाम शनमुगा या शदानन पड़ा। भगवान कार्तिकेय की देखभाल छह स्त्रियां करती थीं, जो कृतिका का प्रतीक थीं और इसी तरह उन्हें कार्तिकेय नाम मिला।

    भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर

    कार्तिकेय का वाहन मोर

    हिंदू पौराणिक ग्रंथों में भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर को बताया जाता है। यह मोर मूल रूप से सुरपद्मा नामक असुर था, जबकि मोर को कृचि नाम का देवदूत बताया जाता था।

    युद्ध में भगवान कार्तिकेय को उकसाने के बाद सुरपद्मा को उस पल पश्चाताप हुआ, जब उनका भाला उन पर आ गिरा, उन्होंने एक पेड़ का रूप धारण किया और प्रार्थना करने लगे। पेड़ दो हिस्सों में कट गया। एक भाग से मुरुगन ने एक मुर्गा निकाला, जिसे उन्होंने अपना प्रतीक चिन्ह बनाया जबकि दूसरे भाग से एक मोर निकला जो उनका वाहन बना।

    कार्तिकेय भगवान का विवाह

    भगवान विष्णु की दो पुत्रियां अमृतावली और सौंदर्यावली जो उनकी आंखों से उत्पन्न हुई थीं। उन्हें स्कंद से अटूट प्यार था और उन्हें पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।

    स्कंद के निर्देश पर अमृतावल्ली ने स्वर्ग में इंद्र की देखरेख में रहने वाली एक युवती देवसेना का अवतार लिया। सौन्दरवल्ली ने कांचीपुरम के समीप रहने वाले शिकारी नाम्बिराज की देखरेख में रहने वाली एक युवती वल्ली का रूप धारण किया। चूंकी वह शिशु अवस्था में लताओं के बीच पाई गई थी, इसलिए शिकारी ने उसका नाम वल्ली रखा। सुरपद्मा के साथ युद्ध खत्म होने के बाद देवता काफी खुश हुए। कार्तिकेय ने इंद्र की प्रार्थना स्वीकार करते हुए देवसेना को अपनी संगिनी के रूप में चुना।

    इसके बाद वे चेन्नई के पास तिरुत्तानी गए, जहां वल्ली जौ के खेतों की देखभाल कर रही थीं। प्रेम-क्रीड़ाओं के सिलसिले के बाद उनके भाई विघ्नेश्वर ने उनकी मदद की और उनसे विवाह कर लिया।

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