भगवान शिव असुरों को वरदान क्यों देते थे? क्या है इसके पीछे का पौराणिक रहस्य
भगवान शिव असुरों को वरदान क्यों देते हैं, जबकि वे बाद में अत्याचार करते हैं। जानिए इसके पीछे की पौराणिक कारण? ...और पढ़ें

शिवजी ने असुरों को ज्यादा वरदान क्यों दिया? (AI Generated Image)
HighLights
शिव तपस्या से प्रसन्न होकर असुरों को वरदान देते हैं।
सुर और असुर ऋषि कश्यप की संतानें, गुणों में भिन्न।
शिव 'भोलेनाथ' हैं, कर्म और भाव को महत्व देते हैं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब कभी भी हम असुरों के बारे में देखते, पढ़ते या सुनते हैं, तो अक्सर एक सवाल दिमाग में आता है कि, भगवान शिव, ब्रह्मा और विष्णु जैसे देवता असुरों को इच्छित वरदान क्यों देते हैं और फिर उनके अत्याचारों का परिणाम भुगतना पड़ता है।
इस बात को स्पष्ट करने के लिए हमें पहले दो जातियों सुर (जिन्हें देवता भी कहा जाता है) और असुर (दैत्य) की विचारधारा और उनके बीच के अंतर को समझने की जरूरत है।
सुर और असुर दोनों का अंतर समझें
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, देव और असुर एक ही पिता ऋषि कश्यप से उत्पन्न हुए हैं। आदित्य (सुर) अदिति के पुत्र हैं और दैत्य (असुर) दिति के पुत्र हैं। असुर एक गुण है, एक ऐसा व्यवहार है जो राजसिक और तामसिक गुणों से भरे हैं। असुर में सत्व गुण का भाव नहीं है, जबकि सुर सत्व गुणों से भरे हैं।
आसान शब्दों में कहें तो असुर सत्ता के प्रति लालची और भूखे थे जो ब्रह्मांड पर शासन करने के लिए श्रेष्ठता प्राप्त करने के मकसद से सुरों के साथ संघर्ष में थे। सुर जिन्हें देव भी कहते हैं। जिन्होंने समुद्र मंथन के दौरान दिव्य अमृत को ग्रहण किया था। वैदिक ज्योतिष के मुताबिक नवग्रहों में शामिल राहु और केतु को छोड़कर किसी भी असुरों ने अमृत नहीं पिया था।
त्रिमूर्ति में भगवान शिव ने असुरों को ज्यादा वरदान क्यों दिए?
अनेक असुरों को उनके कर्मों के हिसाब से भगवान शिव और ब्रह्मा से वरदान की प्राप्ति हुई। उन्होंने गहरी तपस्या की और उसका फल हर जाति के व्यक्ति को मिलता है। अब उस वरदान का इस्तेमाल कैसे किया जाता है यह भी व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता है। कर्म किसी प्राणी के जन्म या जीवन के स्वरूप में अंतर नहीं करता। यह सिर्फ वही देता है जो व्यक्ति को मिलना चाहिए। जो कुछ भी आपको प्राप्त है, आप उसका क्या करते हैं यह आपके व्यक्तित्व को निर्धारित करने का काम करता है।
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त्रिमूर्ति में सबसे आसानी से प्रसन्न हो जाने वाले देवता भगवान शिव हैं (जिन्हें भोलेनाथ भी कहते हैं) ब्रह्मा और विष्णु के विपरीत भगवान शिव अपने भक्तों में अच्छे या बुरे होने में कोई अंतर नहीं करते हैं।

भगवान शिव भाव देखते हैं
यदि कोई असुर अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न करता है, तो वे उसे अनेक वरदान प्राप्त करते हैं। भगवान शिव को निष्कलंक देवता भी कहते हैं, क्योंकि वे भविष्य के परिणामों की चिंता किए बिना ही अपना सब कुछ दे देते हैं। परन्तु भगवान शिव के वरदान को यूं ही नहीं स्वीकार करना चाहिए।
उनका उग्र और विनाशकारी रूप भी है, क्योंकि वे मूल रूप से संहारक के देवता हैं। यदि बुराई अच्छाई पर हावी हो जाती है, तो भगवान शिव या विष्णु भी बुराई का नाश करने के लिए अवतार भी लेते हैं। अलग-अलग पुराणों में शिव, विष्णु और ब्रह्मा जैसे देवता अपने भक्तों को वरदान इसलिए प्रदान करते हैं, क्योंकि वे उनकी तपस्या की सराहना कर सकें।
कुल मिलाकर सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने असुरों को वरदान देकर इस प्रक्रिया की शुरुआत की, जिससे उनके अंत की शुरुआत हुई। संहारक शिव ने असुरों को वरदान देकर अधर्म के विनाश की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम किया।
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