महाभारत युद्ध में योद्धाओं के भोजन का सटीक हिसाब कैसे पता चलता था? जानिए श्री कृष्ण की चमत्कारी लीला!
महाभारत युद्ध में लाखों योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे होती थी, यह एक बड़ा प्रश्न था। आइए जानते हैं इसके पीछे का सच? ...और पढ़ें

महाभारत युद्ध में रोजाना कैसे बनता था सटीक खाना? (AI Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत का नाम सुनते ही हम में से ज्यादातर लोगों के दिमाग में युद्ध, प्रतिशोध और सत्ता के लिए भाइयों की लड़ाई का दृश्य सामने आता है। महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध में शामिल होने के लिए कई देशों से आए योद्धाओं ने भी भाग लिया था।
ऐसे में आपने कभी सोचा है कि, इतनी बड़ी संख्या में आए योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे और किस आधार पर की जाती थी वो भी बिना अन्न की बर्बादी किए।
महाभारत में 45 लाख योद्धाओं का खाना कैसे बनता था?
महाभारत युद्ध के लिए जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि को चुना गया तब पांडव और कौरव दोनों ही पक्षों का अंदाजा हो गया था, इस युद्ध में लाखों की संख्या में योद्धा शामिल होने वाले हैं। जब इन योद्धाओं के भोजन व्यवस्था पर विचार-विमर्श किया गया, तब उडूपी के राजा जिनका नाम पेरुंजोत्रुथियन था, उन तक ये बात पहुंची, तो वे श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे, उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन करते हुए कहा कि, मैं युद्ध में भाग नहीं लूंगा लेकिन महाभारत युद्ध में शामिल होने वाले योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था जरूर करूंगा।
योद्धाओं का भोजन किस आधार पर बनता
लेकिन उडूपी के राजा के सामने यह सबसे बड़ा सवाल था कि, रोजाना भोजन किस आधार पर बनाया जाएगा? खाना कहीं कम या ज्यादा तो नहीं होगा? उनकी इस समस्या का हल श्रीकृष्ण ने पहले ही कर लिया था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 18 दिन चलने वाले इस युद्ध में कभी भी खाना कम नहीं पड़ा और न ही अधिक मात्रा में बचा। जिसका श्रेय भगवान श्रीकृष्ण को दिया जाता है।

2 कथाएं काफी प्रचलित
इसको लेकर दो कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा यह कि रोज शाम को जब भगवान श्रीकृष्ण भोजन करते थे, तब भोजन करते वक्त उन्हें पता चल जाता था कि कल के युद्ध में कितने योद्धा मारे जाने वाले हैं।
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जबकि दूसरी कथा इससे काफी अलग है, जिसमें बताया जाता है कि, भगवान श्रीकृष्ण जितनी मूंगफलियां खाते थे, अगले दिन युद्ध में उतने ही योद्धा मारे जाते थे। इस मतलब यह है कि, श्रीकृष्ण खुद काल का रूप लेकर उन योद्धाओं को निगल लेते थे, जितनी मूंगफलियां थाली में बची रह जाती थीं, अगले दिन युद्ध में उतने ही योद्धा जीवित रहते थे।
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