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    चैत्र नवरात्र 2026: भगवान को भोग लगाने से पहले प्रसाद चखना सही है या गलत? क्या कहते हैं शास्त्र

    Updated: Fri, 20 Mar 2026 01:12 PM (IST)

    क्या भगवान को भोग लगाने से पहले प्रसाद को चखना पाप है? पद्म पुराण और गीता के अनुसार पढ़ें सही नियम। ...और पढ़ें

    Chaitra Navratri 2026: भोग का भोजन चखना सही या गलत? (Image Source: AI-Generated)

    Chaitra Navratri 2026: भोग का भोजन चखना सही या गलत? (Image Source: AI-Generated)

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    संक्षेप में पढ़ें

    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। अक्सर घर के किचन में जब भगवान के लिए हलवा, खीर या कोई खास पकवान बन रहा होता है, तो हमारे मुंह में भी पानी आने लगता है। लेकिन, भगवान को चढ़ाने से पहले हम वह भोग चख नहीं सकते।

    क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे का असली कारण क्या है? क्या वाकई भगवान को लगाने वाले भोग को चखना इतना बड़ा पाप है? क्या भगवान इतने नाराज हो जाएंगे?

    शुद्धता और सम्मान का भाव

    हिंदू धर्म में 'भोग' को सिर्फ खाना नहीं, बल्कि 'नैवेद्य' माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जब तक भोजन भगवान को समर्पित नहीं कर दिया जाता, वह सिर्फ 'अन्न' होता है। लेकिन, भगवान को भोग लगाने के बाद वह 'प्रसाद' बन जाता है। इसलिए, चखने से वह भोजन 'जूठा' (उच्छिष्ट) की श्रेणी में आ जाता है, जिसे अर्पित करना उनका अनादर माना गया है।

    क्यों नहीं चखना चाहिए भगवान का भोग?

    • भारतीय संस्कृति में 'अतिथि देवो भव' की परंपरा है। जैसे हम मेहमान को परोसने से पहले खाना नहीं चखते, वैसे ही भगवान को भोग लगाने से पहले उसे चखना अनुचित है।
    • जिस भोजन को सूंघ लिया गया हो या चख लिया गया हो, वह 'उच्छिष्ट' (जूठा) हो जाता है।
    • भगवान को हमारे छप्पन भोग की जरूरत नहीं है, वे केवल हमारे 'शुद्ध भाव' के भूखे हैं। बिना चखे भोजन बनाना हमारे संयम और श्रद्धा को दर्शाता है।
    • भोग बनाते समय अगर हमारा मन शांत और पवित्र है, तो वह ऊर्जा उस भोजन में भी जाती है। चखने की जल्दबाज़ी मन की चंचलता को दिखाती है।

    क्या कहते हैं शास्त्र?

    पद्म पुराण और स्कंद पुराण में 'शौच' यानी पवित्रता के नियमों का विस्तार से वर्णन है। वहां साफ कहा गया है कि जो भोजन पहले ही चख लिया गया हो, वह देवताओं को अर्पित करने योग्य नहीं रहता।

    Bhog niyam

    (Image Source: AI-Generated)

    श्रीमद्भगवद्गीता के 9वें अध्याय के 26वें श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं- "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति" यानी जो मुझे भक्ति (आदर और मर्यादा) के साथ प्रेम से अर्पण करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूं।

    फिर श्री राम ने क्यों खाए शबरी के जूठे बेर?

    जब भी जूठे भोग की बात आती है, तो लोग अक्सर तर्क देते हैं कि माता शबरी ने तो राम जी को जूठे बेर खिलाए थे। लेकिन, वह 'नियम' नहीं, बल्कि 'परा-भक्ति' (Extreme Devotion) थी। शबरी का भाव यह था कि मेरा प्रभु कोई खट्टा या कड़वा बेर न खा ले। उनका प्रेम उस स्तर का था जहां इंसान खुद को भूल चुका होता है।

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    अगर स्वाद का पता न चले तो क्या करें?

    अगर आपको डर है कि भोग में कुछ कमी रह गई है (जैसे मीठा कम है), तो अपने अनुभव और अंदाज से खाना बनाएं। इसके अलावा, हिंदू धर्म में एक बहुत ही खूबसूरत समाधान है- तुलसी दल। भोग लगाते समय उसमें तुलसी का पत्ता डाल दें।

    मान्यता है कि तुलसी अर्पित करने से भोजन की हर अशुद्धि दूर हो जाती है और वह भगवान के ग्रहण करने योग्य हो जाता है। अगर गलती से आपने भोग चख लिया है, तो उसे भगवान को न चढ़ाएं। उसे परिवार के लिए रख दें और भगवान के लिए दोबारा शुद्ध भाव से भोग तैयार करें।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।