Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    कर्म बड़ा या भाग्य? गरुड़ पुराण और गीता से समझिए आपके जीवन की डोर किसके हाथ में है

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 02:45 PM (IST)

    हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार कर्म और भाग्य के अंतर को समझाते हुए यह लेख गरुड़ पुराण व भगवद्गीता के विचारों को प्रस्तुत करता है। ...और पढ़ें

    कर्म और भाग्य के बीच का अंतर समझिए

    कर्म और भाग्य के बीच का अंतर समझिए

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि, कर्म करने से ही मनुष्य को फल की प्राप्ति होती है। कर्म को धर्म से बड़ा माना जाता है। इसलिए अधिकतर लोग अपने जीवनकाल में अच्छे कर्म को ज्यादा तरजीह देते हैं, ताकि कर्म और न्याय प्रधान देवता शनि देव उन्हें उनके कर्म के हिसाब से फल प्रदान करें।

    हालांकि बहुत से लोग कर्म से ज्यादा भाग्य को महत्व देते हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों में कर्म और भाग्य दोनों का जिक्र किया गया है। आइए समझते हैं दोनों के बीच का प्रमुख अंतर?

    कर्म क्या है?

    गरुड़ पुराण के अनुसार, कर्म वह है, जो हम सोचते, बोलते और करते हैं। हर कर्म का फल जरूर मिलता है, इसलिए मनुष्य अपने कर्म कर्मों के लिए खुद जिम्मेदार होता है। कर्म संस्कृत के मूल शब्द 'कृ' से लिया गया है जिसका मतलब 'करना' या 'कार्य करना' है।

    भगवद्गीता के सबसे गहरे दार्शनिक विचारों में से एक है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कर्म को एक स्थिर नियति की बजाए एक गतिशील, लगातार विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में कार्य करता है। हिंदू धर्म ग्रंथों में कर्म को तीन प्रकारों में बांटा गया है।

    • संचित कर्म
    • प्रारब्ध कर्म
    • क्रियामान कर्म

    difference between karma and destiny in hinduism explained

    संचित कर्म

    एक आत्मा के वो कर्म जो उसने अपनी जीवनकाल में जमा किए हैं। माना जाता है कि, आत्मा कई बार जन्म लेती है और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। प्रत्येक जन्म में उसने कुछ अच्छे या बुरे कर्म किए होंगे। वे सभी कर्म ही संचित कर्म कहलाते हैं। कहने का मतलब संचित कर्म किसी भी आत्मा के द्वारा प्रत्येक जन्मों में किए गए कर्मों का एक बहीखाता (Ledger account) है।

    खबरें और भी

    प्रारब्ध कर्म

    प्रारब्ध का मतलब भाग्य और प्रारब्ध कर्म, कर्म के आधार पर मिला भाग्य। कोई भी मनुष्य अपने संचित कर्मों से पीछा नहीं छुड़ा सकता है, बल्कि उसी कर्म के आधार पर अगले जन्म का भाग्य तय होता है और यह भी कि, इस जन्म में उसे क्या-क्या भोगना पड़ेगा। संचित कर्म ही यह तय करता है कि, आपके अगले जन्म का परिवार, जीवन और भाग्य कैसा होगा।

    क्रियामान कर्म

    क्रियामान कर्म उन कर्मों को कहा जाता है, जो मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में किया जा रहा है या हो रहा है। ये सही है कि, व्यक्ति का भाग्य काफी हद तक संचित कर्मों पर आधारित होता है, लेकिन उसे क्रियामान कर्म के द्वारा बदला जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं एक मनुष्य के क्रियामान कर्म में जितने अच्छे काम होंगे, वे उसके संचित कर्म में मौजूद बुरे कर्मों को कम करता जाएगा।

    भाग्य क्या है?

    गरुड़ पुराण के अनुसार, भाग्य वह फल है, जो हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर हमें मिलते हैं। आज जो हमें सुख-दुख मिल रही है, वह पूर्व कर्मों का परिणाम माना गया है। आज किए गए कर्म ही आगे चलकर भविष्य में भाग्य बनते हैं, इसलिए वर्तमान कर्म करना सबसे जरूरी माना गया है।

    क्या भाग्य बदला जा सकता है?

    गरुड़ पुराण के अनुसार, व्यक्ति दान, धर्म, सेवा, सत्कर्म और प्रायश्चित के माध्यम से अपने कर्मों में सुधार कर भविष्य को बेहतर बना सकता है। कर्म करने से ही भाग्य बनता है। जो व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठता है, उसे हमेशा दुख, निराशा और खालीपन ही मिलता है।

    यह भी पढ़ें- मृत्यु के बाद आत्मा को चुनने पड़ते हैं ये 3 रास्ते, जानिए आपका कर्म आपको कहां ले जाएगा?

    यह भी पढ़ें- धनवान को भी अगले जन्म में भिखारी बना देती हैं ये आदतें, गरुड़ पुराण से समझें कर्मों का खेल

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।