क्या अकाल मृत्यु होने पर आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है? प्रेमानंद जी से जानें इसका जवाब
प्रेमानंद जी महाराज ने इस धारणा को गलत बताया है कि अकाल मृत्यु होने पर आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती ...और पढ़ें

प्रेमानंद जी महाराज का अकाल मृत्यु और आत्मा की मुक्ति पर संदेश (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
अकाल मृत्यु से आत्मा की मुक्ति का संबंध नहीं।
आत्मा की मुक्ति व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर।
अकाल मृत्यु पूर्वजन्म के कर्मों का फल हो सकती है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने अक्सर लोगों को कहते हुए सुना होगा कि अगर किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा को कभी मुक्ति नहीं मिलती है। अकाल मृत्यु वह होती है जब किसी की मृत्यु असमय किसी दुर्घटना या किसी अन्य कारणवश हो जाती है।
यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा हो जाता है तो उनके परिजनों के मन में यह सवाल आता है कि पता नहीं मृतक की आत्मा को शांति मिलेगी या नहीं? बार-बार ऐसी कई आशंकाएं आती हैं कहीं ऐसे में घर में पितृ दोष न लग जाए? यही नहीं कई बार मृतक के परिजन उनकी आत्मा की संतुष्टि के लिए कई उपाय भी करते हैं, लेकिन क्या सच में अकाल मृत्यु वाले लोगों की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है? आइए आपको बताते हैं भक्त के इस सवाल का जवाब प्रेमानंद जी महाराज ने क्या बताया है?
आत्मा की मुक्ति के लिए मृत्यु का कारण नहीं कर्म जरूरी हैं
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि यह मान लेना कि एक्सीडेंट या अकाल मृत्यु होने से आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है यह सही नहीं है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए यह भी बताया है कि ऐसे तो कई बार बड़े-बड़े साधु-संतों की भी अकाल मृत्यु हो जाती है, तो क्या उन्हें भी मुक्ति नहीं मिलती है?
किसी भी व्यक्ति की मृत्यु कैसे हुई, यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह मायने रखता है कि उसने जीवन कैसे जिया है। व्यक्ति की आत्मा की मुक्ति के लिए उसके कर्म ही जिम्मेदार होते हैं।
जीवित अवस्था में व्यक्ति के द्वारा किए गए कर्म ही मृत्योपरांत उसकी आत्मा के मोक्ष का कारण बनते हैं। जीवनभर ईश्वर का भजन कीर्तन करने वाले व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो भी जाए तो उसे मोक्ष मिलता है। वहीं जो पाप कर्म करता है और उसकी अकाल मृत्यु न भी हो तब भी उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है।
क्या अकाल मृत्यु पहले से तय होती है?
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि अकाल मृत्यु पहले से तय नहीं होती है। अचानक कोई घटना घटी और शरीर छूटता है तो अकाल मृत्यु हो सकती है।
अचानक से कोई महान पाप बन गया जिसके दंड के रूप में अकाल मृत्यु होती है। अकाल मृत्यु पहले से तय नहीं होती है, तय होती है मृत्यु। कई बार जाने या अनजाने में कोई महत अपराध बन जाता है तो व्यक्ति की आयु क्षीण हो जाती है और उसकी आयु क्षीण होकर अकाल मृत्यु का योग बनाती है।
भक्त ने और सवाल किया कि अगर कोई छोटा बच्चा भी अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो क्या यह उसका पूर्व का कोई बड़ा प्रारब्ध है? इसका उत्तर देते हुए प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि कि हां बच्चे को उसके पूर्वजन्मों का फल मिलता है तब उसके जीवन में अकाल मृत्यु के योग बन सकते हैं। प्रेमानंद जी कहते हैं कि शरीर बदलने से आत्मा के कर्म समाप्त नहीं होते हैं इसलिए चाहे छोटा बच्चा हो या गर्भस्त शिशु ही क्यों न हो उसे उसके कर्मों का फल अवश्य मिलता है जिसकी वजह से अकाल मृत्यु हो सकती है।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार वास्तविकता यह है कि अकाल मृत्यु होने और आत्मा को मोक्ष मिलने का कोई संबंध नहीं है बल्कि यह कर्मों का ही लेखा जोखा होता है।
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