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    उत्तराखंड का वह गांव जहां हर रात हनुमान जी के लिए रखा जाता है भोजन, वजह जानकर उड़ जाएंगे होश

    Updated: Mon, 06 Jul 2026 01:00 PM (IST)

    उत्तराखंड के द्रोणागिरी गांव में सदियों से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है, जहां हर रात हनुमान जी के लिए घरों के बाहर भोजन रखा जाता है। यह प्रथा रामाय ...और पढ़ें

    इस गांव में आज भी आते हैं हनुमान जी! (Picture Credit-AI Image)

    इस गांव में आज भी आते हैं हनुमान जी! (Picture Credit-AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के शांत पहाड़ों के बीच में बसा एक ऐसा गांव जहां सदियों से एक खास परंपरा निभाई जा रही है। हर रात सूरज ढलने के बाद गांव के लोग घरों के बाहर खाना रखते हैं। जनवारों या किसी मेहमान के लिए नहीं, बल्कि हनुमान जी के लिए।

    इस गांव का नाम है द्रोणागिरी जहां आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही है परंपरा जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी है। क्या है इसके पीछे की पौराणिक कहानियां आइए जानते हैं इसके बारे में?

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    गांव की अनोखी परंपरा रामायण काल से जुड़ी

    दरअसल द्रोणागिरी गांव की इस परंपरा का संबंध रामायणकाल से जुड़ा है। लंका में युद्ध के दौरान लक्ष्मण बुरी तरह से घायल हो गए थे। उनका एकमात्र इलाज हिमालय में उगने वाली संजीवनी नाम की एक दुर्लभ जड़ी बूटी थी।

    इस काम को पूरा करने के लिए हनुमान जी को चुना गया और वे वर्तमान के द्रोणागिरी पहाड़ के पास पहुंचे। जड़ी बुटी की पहचान न कर पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और लंका की ओर चल पड़े। इस पौराणिक घटना ने उस क्षेत्र को एक पवित्र स्थान की पहचान दी, जिसे भक्त आज दिव्य शक्ति से जोड़कर देखते हैं।

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    द्रोणागिरी में आज भी इस अनुष्ठान का पालन

    द्रोणागिरी के कुछ हिस्सों में कुछ परिवार इस अनुष्ठान का श्रद्धा के साथ पालन करते हैं। भोजन करने के बाद भोजन के छोटे-छोटे हिस्से घरों के बाहर या पवित्र स्थानों पर रखा जाता है। यह प्रसाद सात्त्विक औ सादा होता है।

    अक्सर इसमें रोटी, फल या प्रसाद शामिल होता है। ग्रामीण इसे कोई भव्य समारोह नहीं मानते हैं, बल्कि यह हनुमान जी के प्रति भक्ति का एक विनम्र प्रतीक माना जाता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि, पर्वत से जुड़ी यह प्राचीन कथा की वजह से यह जमीन खुद पवित्र बनी रहती है।

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    यह परंपरा किसी सीख से कम नहीं?

    द्रोणागिरी में यह अनुष्ठान सिर्फ बाहर भोजन रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। आस्था हमेशा भव्य मंदिरों या शोरगुल भरे समारोहों की जरूरत नहीं होती है। कभी-कभी यह पीढ़ियों से दोहराए जाने वाले सरल कार्यों के जरिए भी जीवित रहती है।

    ग्रामीणों का मानना है कि, हनुमान जी के प्रति श्रद्धा रखने से उनकी भूमि सुरक्षित रहने के साथ पवित्र भी रहती है। यह कहानी इस बात का प्रतीक है कि, प्राचीन मान्यताएं आज भी कई समुदायों के आध्यात्मिक अनुभवों को प्रभावित करती है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।