श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाए बिना क्यों अधूरी है पूजा? एकदंत संकष्टी चतुर्थी से पहले जान लें जरूरी नियम
भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व है। अनलासुर और राजा जनक की इन पौराणिक कथाओं में पढ़ें ...और पढ़ें

गणेश जी को दूब चढ़ाने के सही नियम क्या हैं? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से होती है। बप्पा को प्रसन्न करने के लिए भक्त उन्हें मोदक और लड्डू चढ़ाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक छोटी सी घास यानी 'दूर्वा' के बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है? इसके पीछे की दो पौराणिक कथाएं हैं।
1. जब गणेश जी ने निगला 'अनलासुर' राक्षस
गणेश पुराण (उपासना खंड) के अनुसार, प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक भयंकर राक्षस था। उसकी आंखों से आग निकलती थी और वह ऋषि-मुनियों को जिंदा निगल जाता था। जब उसका आतंक बढ़ा, तो गणेश जी ने उससे युद्ध किया और उसे खुद ही निगल लिया। राक्षस को निगलने के बाद गणेश जी के पेट में भयंकर जलन होने लगी। कई उपाय किए गए, लेकिन शांति नहीं मिली। तब कश्यप ऋषि ने गणेश जी को 21 दूर्वा की गांठें खाने को दीं। दूर्वा खाते ही गणपति बप्पा के पेट की जलन शांत हो गई। तभी से उन्हें दूर्वा चढ़ाना जरूरी माना गया है।
2. राजा जनक का अहंकार और दूर्वा का चमत्कार
वहीं, मुद्गल पुराण और गणेश माहात्म्य में वर्णित कथा के अनुसार, राजा जनक को अपनी शक्ति और वैभव पर अहंकार हो गया था। उनका घमंड तोड़ने के लिए गणेश जी ब्राह्मण वेश में मिथिला पहुंचे। वहां उन्होंने राजा के महल का सारा भोजन खा लिया, लेकिन उनकी भूख शांत नहीं हुई। हारकर जनक ने अपनी गलती मानी। तब गणेश जी एक गरीब ब्राह्मण के घर पहुंचे, जहां ब्राह्मण की पत्नी ने उन्हें श्रद्धा के साथ दूर्वा भेंट की। उसे खाते ही गणेश जी की भूख तुरंत मिट गई और वे तृप्त हो गए।
दूर्वा चढ़ाने के जरूरी नियम
गणेश जी को दूर्वा अर्पित करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- हमेशा 11 या 21 दूर्वा बप्पा को अर्पित करें।
- दूर्वा किसी साफ जगह या मंदिर के बगीचे से ही तोड़नी चाहिए। गंदी जगहों या नाली के पास उगी घास न लें।

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- चढ़ाने से पहले दूर्वा को साफ पानी से अच्छी तरह धो लें।
भगवान गणेश की पूजन विधि
- सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- बप्पा को पवित्र जल से स्नान (अभिषेक) कराएं। इसके बाद उन्हें सिंदूर, अक्षत (बिना टूटे चावल), फूल और सुगंधित धूप-दीप अर्पित करें।
- गणेश जी को उनकी प्रिय दूर्वा (दूब घास) चढ़ाएं। ध्यान रहे कि हमेशा 11 जोड़ों में (22 दूर्वा) अर्पित करना सबसे उत्तम होता है।
- पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का 108 बार या यथाशक्ति जाप करें।
- संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा या गणेश जन्म की पौराणिक कथा को श्रद्धापूर्वक सुनें या पढ़ें। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
- शाम को चंद्रमा निकलने के बाद एक पात्र में जल, थोड़ा दूध और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ दें।
- अंत में भगवान गणेश की आरती करें, उन्हें मोदक का भोग लगाएं और उसी प्रसाद को ग्रहण कर अपना व्रत खोलें।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
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