एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: व्रत के दौरान भूलकर भी न करें ये गलतियां, नोट करें सही पूजा विधि और नियम
एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा का विधान है। ...और पढ़ें

Sankashti Chaturthi Dos and Donts: संकष्टी चतुर्थी व्रत नियम। Ai Generated image

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है और उनकी कृपा पाने के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत सबसे शुभ माना गया है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन से सभी विघ्न-बाधाओं को दूर कर देती है। इस बार यह व्रत 5 मई को पड़ रहा है। ऐसे में आइए इस पर्व से जुड़ी प्रमुख बातों को जानते हैं।

भूलकर भी न करें ये गलतियां
- चंद्र दर्शन से पहले भोजन - संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है। अर्घ्य से पहले अन्न का सेवन न करें।
- गणेश जी की पीठ के दर्शन - कहा जाता है कि गणेश जी की पीठ में दरिद्रता का वास होता है, इसलिए कभी भी उनकी पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए। हमेशा उनकी सामने से ही प्रार्थना करें।
- तुलसी का प्रयोग - गणेश जी की पूजा में तुलसी दल का प्रयोग वर्जित माना जाता है। ऐसे में उन्हें केवल दूर्वा ही अर्पित करें।
- तामसिक भोजन - इस दिन घर में लहसुन, प्याज या मांसाहार का प्रयोग बिल्कुल न करें। मन में क्रोध या ईर्ष्या जैसे नकारात्मक विचार न लाएं।
- अर्घ्य में गलती - चंद्रमा को अर्घ्य देते समय जल की धारा पैरों पर नहीं गिरनी चाहिए। इसका ध्यान रखें।
सही पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
- चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
- उन्हें सिंदूर, अक्षत और दूर्वा अर्पित करें।
- 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करें।
- गणेश जन्म या इस व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
- चंद्रमा निकलने पर जल, दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें और गणेश जी की आरती के साथ व्रत का पारण करें।
व्रत के नियम और महत्व
एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन दान का विशेष महत्व है। इस दिन ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को तिल और लड्डू दान करने से अटके हुए काम बन जाते हैं। यह व्रत विशेष रूप से मानसिक शांति और संतान की रक्षा के लिए रखा जाता है।
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