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क्यों कहलाईं मां गंगा 'जाह्नवी'? राजा भगीरथ की तपस्या और गंगा सप्तमी की पौराणिक कथा

Published: Thu, 23 Apr 2026 07:00 AM (IST)Updated: Thu, 23 Apr 2026 08:22 AM (IST)

राजा सगर के 60 हजार पुत्रों के उद्धार से लेकर जह्नु मुनि के कान से निकलने तक, जानें मां गंगा ...और पढ़ें

गंगा सप्तमी की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

गंगा सप्तमी की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में मां गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी देवी माना गया है। 23 अप्रैल 2026, गुरुवार यानी आज देशभर में गंगा सप्तमी का पावन पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मां गंगा के जन्मोत्सव या पुनर्जन्म दिवस के रूप में पूजा जाता है।

अक्सर लोग गंगा सप्तमी (Ganga Saptami 2026) और गंगा दशहरा के बीच भ्रमित हो जाते हैं। दरअसल, गंगा सप्तमी वह दिन है जब मां गंगा धरती पर प्रकट हुई थीं, जबकि ज्येष्ठ माह में आने वाला गंगा दशहरा उनके धरती पर अवतरण का दिन है।

राजा सगर का अश्वमेघ यज्ञ

सनातन शास्त्रों में मां गंगा का धरती पर आना केवल एक नदी का प्रवाह नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा और कठिन तपस्या की विजय गाथा है। आइए जानते हैं उस इतिहास को, जिसने रसातल (अत्यंत गहरा पाताल लोक) में सोए पूर्वजों को मोक्ष दिलाया।

त्रेता युग में अयोध्या के प्रतापी राजा सगर ने चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। परंपरा के अनुसार, उन्होंने अपने पुत्रों को यज्ञ के घोड़े की रक्षा के लिए भेजा। लेकिन इंद्र के भय या किसी माया के कारण वह घोड़ा अचानक गायब हो गया। खोजते-खोजते सगर पुत्र कपिला ऋषि के आश्रम पहुंचे। वहाँ घोड़े को बंधा देख उन्होंने ऋषि का अपमान कर दिया। क्रोधित कपिला ऋषि की एक ही दृष्टि से राजा सगर के सभी पुत्र जलकर भस्म हो गए।

जब राजा सगर को यह पता चला, तो वे शोक में डूब गए। कपिला ऋषि ने बताया कि इन पूर्वजों को केवल मां गंगा ही मोक्ष दिला सकती हैं। सगर के वंशज अम्सुमन और राजा दिलीप ने बहुत प्रयास किए, लेकिन वे गंगा को प्रसन्न न कर सके। अंततः, दिलीप के पुत्र भगीरथ ने राज-पाट त्याग दिया और हिमालय की कंदराओं में मां गंगा की ऐसी कठोर तपस्या की, कि स्वयं देवी को प्रकट होना पड़ा।

Ganga Saptami 2026

(Image Source: AI-Generated)

मां गंगा धरती पर आने को तैयार तो हुईं, लेकिन एक बड़ी चुनौती थी- उनका प्रचंड वेग! अगर गंगा सीधे स्वर्ग से गिरतीं, तो पृथ्वी उसे सह नहीं पाती। तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। महादेव ने गंगा के अहंकार और वेग को थामने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में समेट लिया। भगीरथ की प्रार्थना पर शिव ने अपनी एक जटा खोली, जहां से गंगा की धारा पृथ्वी की ओर बढ़ी।

धरती पर बहते हुए गंगा का वेग इतना अधिक था कि रास्ते में जह्नु मुनि की यज्ञशाला बह गई। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने पूरी गंगा को पी लिया। भगीरथ फिर दुविधा में पड़ गए! उन्होंने जह्नु मुनि को प्रसन्न किया। तब वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन ऋषि ने अपने कान से गंगा को बाहर निकाला। ऋषि की संतान (पुत्री) के रूप में दोबारा प्रकट होने के कारण ही उनका नाम 'जाह्नवी' पड़ा।

अंततः भगीरथ गंगा की धारा को लेकर उस स्थान पर पहुंचे जहां उनके पूर्वजों की अस्थियां थीं। जैसे ही मां गंगा के पवित्र जल ने उन अस्थियों को छुआ, राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। नारद पुराण में गंगा के पृथ्वी पर आगमन और ऋषि जह्नु के प्रसंग का विस्तृत वर्णन है। इसमें बताया गया है कि वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ही गंगा जी ने जह्नु ऋषि के कान से मुक्त होकर पुनर्जन्म लिया था, जिससे उनका नाम 'जाह्नवी' पड़ा।

पूजा विधि और विशेष फल

  • गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान का महत्व शास्त्रों में 'अश्वमेध यज्ञ' के समान बताया गया है।
  • माना जाता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के अनजाने में किए गए पाप कट जाते हैं और उसे ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है।
  • अगर आप गंगा तट पर नहीं जा सकते, तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • स्नान के बाद मां गंगा की आरती करें और दीप दान करें। यह दिन मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।