क्यों जीवन के अंतिम क्षणों में मुख में रखे जाते हैं तुलसी और गंगाजल? गरुड़ पुराण में बताई है वजह
हिंदू धर्म में मृत्यु के समय मुंह में गंगाजल और तुलसी रखने की परंपरा है। ऐसा करना अत्यंत पवित्र माना जाता है।
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मृत्यु के समय गंगाजल और तुलसी का महत्व (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
तुलसी, भगवान विष्णु को अति प्रिय है
गंगाजल पापों का नाश कर मोक्ष दिलाता है
यह विधि आत्मा की अगली यात्रा को सुगम बनाती है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में मृत्यु के अंतिम क्षणों में व्यक्ति के मुंह में गंगाजल और तुलसी का पत्ता रखना एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य परंपरा मानी गई है। इसके पीछे कई गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण छिपे हुए हैं। चलिए जानते हैं कि इस बारे में गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है?
इसलिए रखी जाती है तुलसी
हिंदू धर्म में तुलसी को सबसे पवित्र और पूजनीय पौधा माना गया है, जो सात्विकता का प्रतीक भी है। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसीलिए इसे 'हरिप्रिया' भी कहा जाता है। यह मान्यता है कि जिसके मुख में मृत्यु के समय तुलसी दल होता है, उसे सीधे भगवान विष्णु के परमधाम यानी वैकुंठ में स्थान मिलता है।
गरुड़ पुराण में भी इस बात का उल्लेख है कि मृत्यु के समय जिस व्यक्ति के सिर, छाती या मुख पर तुलसी का पत्ता होता है, उसके पास यमदूत (यमराज के दूत) नहीं आते, बल्कि विष्णुदूत उस आत्मा को सम्मानपूर्वक लेकर जाते हैं।
मुंह में गंगाजल रखने का महत्व
गंगा नदी को सनातन परंपरा में केवल एक नदी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि साक्षात 'मोक्षदायिनी' (मोक्ष देने वाली) मां माना गया है। ऐसे में मृतक के मुख में गंगाजल डालने से उसके कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि मृत्यु के समय किसी के कंठ से गंगाजल नीचे उतरता है, तो उस आत्मा को यमलोक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते और वह सीधे मोक्ष (सर्वोच्च गति) को प्राप्त करता है।
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(Picture Credit- AI Generated)
इसलिए महत्वपूर्ण है यह विधि
शास्त्रों में माना गया है मृत्यु के समय मुख में तुलसी या गंगाजल डालने का अनुष्ठान जीवात्मा की अगली यात्रा को सुगम, शांतिपूर्ण और पवित्र बनाने के लिए किया जाता है। मृतक के मुख में गंगाजल या तुलसी आदि रखने का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को सांसारिक मोह-माया से मुक्त कर मुक्ति यानी मोक्ष प्रदान करना और शरीर व आत्मा की पवित्रता सुनिश्चित करना है।
यह परंपरा आत्मा की शांति, परलोक यात्रा को सफल बनाने और शरीर को अंत समय में सात्विक ऊर्जा प्रदान करने का एक अंतिम आध्यात्मिक प्रयास भी है। ऐसे में यह कहा जा सकता है, कि यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि इंसान ने चाहे जीवन कैसा भी जिया हो, लेकिन उसका अंत पूरी तरह पवित्र, सात्विक और शांतिपूर्ण होना चाहिए ताकि उसकी आत्मा को सद्गति मिल सके।
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