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    क्यों बच्चों को अग्नि देने के बजाय दफनाया जाता है? गरुड़ पुराण में मिलती है खास वजह

    Updated: Fri, 15 May 2026 03:30 PM (IST)

    हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार की परंपरा है, लेकिन शिशुओं के लिए नियम अलग हैं। आइए यहां जानते हैं। ...और पढ़ें

    Garuda Purana Secrets: गरुड़ पुराण के अनुसार शिशुओं को क्यों नहीं दी जाती अग्नि?

    Garuda Purana Secrets: गरुड़ पुराण के अनुसार शिशुओं को क्यों नहीं दी जाती अग्नि?

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, जिसमें अंतिम संस्कार सबसे महत्वपूर्ण है। मृत्यु के बाद शव को मुखाग्नि देने या दाह संस्कार करने की परंपरा है।

    लेकिन आपने ध्यान दिया होगा कि छोटे बच्चों की मृत्यु होने पर उन्हें जलाया नहीं जाता, बल्कि दफनाया या जल में प्रवाहित किया जाता है। इसके पीछे की क्या वजह है? आइए गरुड़ पुराण के अनुसार जानते हैं।

    शिशुओं को मुखाग्नि न देने के पीछे क्या है धार्मिक कारण?

    गरुड़ पुराण के अनुसार, दाह संस्कार करने के पीछे की खास वजह है ये शरीर को पंचतत्व में विलीन करना और आत्मा का इस संसार से मोह भंग करना है। एक वयस्क व्यक्ति जीवन भर रिश्तों, धन और कामनाओं के मोह में बंधा रहता है। अग्नि संस्कार इस मोह-माया को जलाने का प्रतीक है। ताकि आत्मा को सद्गति मिले।

    एक छोटे बच्चे का न तो किसी से कोई गहरा मोह होता है और न ही उसने कोई कर्म इकट्ठे किए होते हैं। इसलिए उसकी आत्मा को शुद्ध करने के लिए अग्नि की जरूरत नहीं पड़ती है।

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    शुद्धता और दिव्य स्वरूप

    शास्त्रों में बच्चों को भगवान का स्वरूप माना गया है। वे दोष और पापों से मुक्त होते हैं, क्योंकि उनका मन और आत्मा पहले से ही शुद्ध होती है, इसलिए उन्हें पवित्र करने की कोई धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं किया जाता है। इसी वजह से उन्हें सीधे दफनाया जाता है, जिसे भू-समाधि के रूप में देखा जाता है।

    बच्चों के अंतिम संस्कार के नियम

    गरुड़ पुराण के अनुसार, बालक की आयु दो सालों से कम है, तो उसका दाह संस्कार नहीं करना चाहिए। इसके पीछे एक कारण शरीर का पूर्ण रूप से विकसित न होना भी है। बच्चों का शरीर बेहद कोमल होता है और उनके दांत भी पूरी तरह नहीं निकले होते। शास्त्रों में दांत निकलने या मुंडन संस्कार से पहले की अवस्था को बहुत ही कोमल माना गया है, जिसे अग्नि के हवाले करना गलत माना गया है।

    अधूरी यात्रा

    एक अन्य धार्मिक मान्यता यह भी है कि छोटे बच्चों की आत्मा का जीवन चक्र बहुत छोटा होता है। वे अपनी किसी अधूरी यात्रा को पूरा करने के लिए ही आते हैं। दफनाने की प्रक्रिया इस दिखाती है कि आत्मा प्रकृति में शांत रहकर फिर शरीर धारण करने के लिए तैयार हो सके।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।