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    मनुस्मृति से गीता तक जानिए Extra Marital Affair पर क्या कहते हैं हमारे पौराणिक ग्रंथ?

    Updated: Sun, 17 May 2026 03:06 PM (IST)

    हिंदू धर्मग्रंथों जैसे मनुस्मृति, महाभारत और गीता में विवाहेतर संबंधों को अधर्म माना गया है। ये संबंध व्यक्ति की प्रतिष्ठा, धर्म और सामाजिक मान-सम्मान ...और पढ़ें

    शास्त्रों में 'एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर' भूल या महापाप? (AI-Generated Image)

    शास्त्रों में 'एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर' भूल या महापाप? (AI-Generated Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू वैदिक और धर्मशास्त्र से जुड़ी परंपराओं में Extra Marital Affair यानी विवाह के बाद भी बाहर संबंध बनाने को सामान्य गलती नहीं, बल्कि परस्त्रीगमन या व्यभिचार माना गया है।

    हिंदू धर्म से जुड़े अलग-अलग ग्रंथों में इसके दंड भी अलग हैं। लेकिन धार्मिक नजरिया से इस कार्य को परिवार, समाज और धर्म व्यवस्था के विरुद्ध माना गया है।

    मनुस्मृति में क्या कहा गया है?

    मनुस्मृति ग्रंथ के अनुसार, शादी के बाद भी बाहर किसी के साथ संबंध स्थापित करना अधर्म कार्य माना गया है। इसमें बताया गया है कि, परस्त्रीगमन से व्यक्ति की प्रतिष्ठा, धर्म और सामाजिक मान-सम्मान सब कुछ खत्म हो जाता है।

    मनुस्मृति के अध्याय 8 में व्यभिचार और परस्त्रीगमन जैसे अधर्म कार्य के लिए सामाजिक दंड, जुर्माना और कठोर निंदा का उल्लेख किया गया है। हालांकि आज के आधुनिक समय में इन दंडों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है।

    लेकिन यह दिखाता है कि, विवाह के बाद भी दूसरे पुरुष-स्त्री के साथ संबंध स्थापित करना उस दौर में भी कितना बड़ा अपराध माना जाता था।

    धर्मशास्त्रों में विवाहेतर संबंधों पर विचार

    परस्त्रीगमन पर महाभारत का नजरिया

    महाभारत के कई प्रसंगों में स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है कि, अनियंत्रित कामवासना और विवाह के बाद किसी और के साथ संबंध स्थापित करना व्यक्ति के विनाश, अपमान और परिवार के टूटने का कारण बनता है।

    महाभारत काल में जब कीचक ने द्रौपदी पर गंदी नजर डालने की कोशिश की, तो आखिर में उसे मृत्यु की प्राप्ति हुई।

    इंद्र और अहिल्या की कथा (जिसका उल्लेख रामायण और पुराणों में भी) में छल और परस्त्री संबंध को पाप की श्रेणी में रखा गया है।

    महाभारत का 13वां पर्व (अनुशासन पर्व) जब भीष्म पीताम्ह धर्म, संयम और दांपत्य निष्ठा को गृहस्थ धर्म का आधार बताते हैं।

    गरुड़ पुराण में व्यभिचार की परिभाषा

    गरुड़ पुराण में व्यभिचार को उन कर्मों में शामिल किया जाता है, जो मृत्यु के बाद भी कष्टकारी फल प्रदान करते हैं। काम, लोभ और छल से स्थापित किए गए संबंधों को आत्मिक पतन का सबसे बड़ा कारण बताया गया है।

    भगवद्गीता में सीधे तौर पर Extra Marital Affair जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है, लेकिन इंद्रिय को काबू में रखने की बात पर जोर दिया गया है।

    गीता में काम और असंयम को व्यक्ति के पतन का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। गीता में एक श्लोक में कहा गया है कि, 'काम एष क्रोध एष'

    अर्थात्- अनियंत्रित इच्छा व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता को खत्म कर देती है।

    सच्चाई यह है कि, ज्यादातर हिंदू धर्म ग्रंथों में विवाह को दो लोगों के बीच का पवित्र बंधन माना जाता है, इसलिए शास्त्रों में विवाहेतर (Extramarital Affairs) संबंध स्थापित करना सही नहीं माना जाता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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