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    क्या पति के निधन के बाद महिला का सजना-संवरना गलत है? वेद और पुराणों में छिपा हैरान करने वाला जवाब

    Updated: Fri, 10 Jul 2026 02:01 PM (IST)

    पति के निधन के बाद महिला को शृंगार करना चाहिए या नहीं। ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा और धर्मग्रंथों के हवाले से जानिए इसके पीछे का सच। ...और पढ़ें

    विधवा महिला का श्रृंगार करना सही या गलत (Picture Credits- AI Image)

    विधवा महिला का श्रृंगार करना सही या गलत (Picture Credits- AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हममें से ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि, जब किसी महिला का पति गुजर जाता है, तो उसे जीवनभर सफेद साड़ी, सूनी कलाइयां और बिना शृंगार किए अपनी जिंदगी बितानी पड़ती है। बचपन से हम यही देखते और सुनते आए हैं। लेकिन क्या सच में एक विधवा स्त्री को शृंगार करने या रंग-बिरंगे कपड़े पहनने का हक नहीं होता है। आइए जानते हैं हिंदू शास्त्रों और ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा से इसके पीछे का सच?

    ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, हमारे समाज में सदियों से एक रूढ़िवादी धारणा चली आ रही है कि पति की मृत्यु के बाद स्त्री को समस्त सांसारिक सुखों और विशेषकर शृंगार से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। लेकिन जब हम सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, वेदों और उपनिषदों का गहराई से पढ़ते हैं, तो हमें एक बेहद प्रगतिशील और संवेदनशील नजरिया देखने को मिलता है।

    विधवा महिला के शृंगार करने पर शास्त्र क्या कहते हैं?

    धर्मग्रंथों और प्राचीन इतिहास को देखें तो सत्य पूरी तरह अलग दिखाई देता है।

    मूल ग्रंथों के नियम
    शास्त्र कभी भी किसी आत्मा को उसकी असल और सम्मान से दूर करने की आज्ञा नहीं देते। सनातन परंपरा में शृंगार सिर्फ शारीरिक आकर्षण का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन की जीवंतता, मानसिक प्रसन्नता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

    मध्यकाल के कड़े नियम
    इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक संदर्भ मिलते हैं जहां विपरीत परिस्थितियों में भी स्त्रियों ने अपने आत्मसम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए शालीन वेशभूषा धारण की। मध्यकाल में सुरक्षा और वैराग्य के नाम पर जो कड़े नियम थोपे गए, उन्हें धीरे-धीरे शास्त्रों का नाम दे दिया गया, जो कि पूरी तरह गलत है।

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    सात्विक शृंगार और सामाजिक गरिमा

    एक विधवा स्त्री का जीवन पहले ही एक बड़े वियोग से गुजर रहा होता है। ऐसे में उसे समाज की मुख्यधारा से काटना या उसे बेरंग जीवन जीने पर मजबूर करना पूरी तरह गलत है।

    यदि कोई स्त्री मानसिक रूप से स्वस्थ रहने, समाज में सम्मानपूर्वक जीने या अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए सात्विक शृंगार जैसे बिंदी, स्वच्छ वस्त्र, या शालीन आभूषण धारण करना चाहती है, तो शास्त्र इसकी कतई मनाही नहीं करते।

    धर्म ग्रंथों के अनुसार, अंतरात्मा की प्रसन्नता ही सबसे बड़ा धर्म है। अतः रूढ़िवादिता को छोड़कर हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर स्त्री को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का पूरा अधिकार है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।