बेईमान लोगों के पास ज्यादा पैसा क्यों होता है? हिंदू धर्मग्रंथों से समझें धन और कर्म का रहस्य
आखिर कलियुग में बेईमान और दुष्ट लोगों के पास लक्ष्मी जी क्यों वास करती हैं? मनुस्मृति और हिंदू पुराणों में बताया गया है इसके पीछे का सच? ...और पढ़ें

बेईमानों के पास क्यों है खूब पैसा! (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कभी सोचा है आपने बेईमान लोगों के पास पैसा और सफलता क्यों दिखाई देती है, जबकि ईमानदार व्यक्ति हमेशा संघर्ष करता ही दिखाई देता है। इस सवाल का जवाब हमारे हिंदू धर्म ग्रंथ शास्त्रों में काफी गहराई से दिया गया है।
हमें सबसे पहले इस बात को समझने की जरूरत है कि, मां लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी ही नहीं हैं। धन के साथ-साथ उन्हें समृद्धि, शुभता, सौभाग्य, सद्गुण और आध्यात्मिक कल्याण की देवी भी कहा जाता है। इसलिए जब कभी भी हम किसी बेईमान इंसान के पास पैसा-संपत्ति देखते हैं, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि, मां लक्ष्मी उस व्यक्ति से खुश है। आइए धार्मिक ग्रंथों से जानते हैं इसके पीछे का सच।
मनुस्मृति में मानवीय पीड़ा का साफ वर्णन देखने को मिलता है कि, जो मनुष्य भ्रष्ट और अधर्मी है, वह भले ही फलते-फूलते दिखाई दे सकता है, लेकिन यह सिर्फ अस्थायी सफलता है, जो कभी भी स्थायी नहीं हो सकती है।
नाधर्मश्चवरितो लोके सद्यः फलति गौरव । शनेरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥
जिस तरह धरती में बोया गया बीज फौरन फल नहीं प्रदान करता है, उसी तरह इस लोक में किया गया अधर्म तुरंत फल नहीं प्रदान करता है। वह धीरे-धीरे पनपता है और उस अधर्म करने वाले की जड़ों को काट देता है।
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हमारे हिंदू शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति अधर्म और बेईमान के रास्ते पर चलकर पैसा कमाता है, उसकी अंतिम गति कुछ इस तरह होती है।
अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ 4.174 ॥ मनुस्मृति
अधर्मेणैधते तावत्- सबसे पहले व्यक्ति अधर्म और बेईमानी के मार्ग पर चलकर उन्नति और समृद्धि प्राप्त करता है।
ततो भद्राणि पश्यति- उसके बा वह सुख, वैभव, ऐश्वर्य और शुभ परिस्थितियों का भोग करता है।
ततः सपत्नान् जयति- इसके बाद वह अपने शत्रुओं और आलोचकों पर जीत हासिल करता हुआ ऐसा सोचता है कि मानो उसे कोई हरा नहीं सकता है।
समूलस्तु विनश्यति- लेकिन आखिर में जब उसके पूर्वजन्मों और इस जन्म के पुण्य समाप्त हो जाते हैं, तो वह अपनी जड़ों समेत खत्म हो जाता है।

मां लक्ष्मी की कृपा का साक्षात प्रमाण क्या है?
आज कल लोगों के बीच में एक गलतफहमी यह भी है कि, धन का होना भगवती लक्ष्मी की कृपा का साक्षात प्रमाण है। पद्म पुराण के अनुसार लक्ष्मी जी की ज्येष्ठ बहन अलक्ष्मी का वर्णन देखने को मिलता है। अलक्ष्मी को दुख, दुर्भाग्य, कष्ट और कलह का प्रतीक माना जाता है। जहां एक ओर मां लक्ष्मी धर्मसंगत और ईमानदार परिश्रम से धन कमाने वाले के घर में प्रवेश करती हैं, वहीं अलक्ष्मी छल, कपट, चोरी और दूसरों के शोषण से अर्जित धन वाले घर में प्रवेश करती हैं।
शास्त्रों में वर्णन है कि, अलक्ष्मी भौतिक समृद्धि का रूप धारण करके घर में प्रवेश करती हैं। अब ऐसे में बाहरी नजरिए से भले ही कोई बेईमान और दुष्ट व्यक्ति काफी सफल और संपन्न दिखाई दे सकता है, लेकिन अलक्ष्मी की उपस्थिति उस धन को मानसिक पीड़ा का कारण बना देती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार अधर्मपूर्वक तरीके से धन अर्जित करने वाले अपने साथ अनिद्रा, डर और संशय, पारिवारिक रिश्तों में दरार और विनाशकारी व्यसनों को भी लेकर आता है। शास्त्र में कहा गया है कि, धर्म के बिना हासिल किया गया पैसा दिव्य कृपा का पात्र नहीं है, बल्कि स्वर्ण पात्र में लिपटा हुआ आध्यात्मिक विष है।
पूर्व जन्म के कर्म कैसे दिखाते हैं असर?
बृहदारण्यक उपनिषद के मुताबिक, व्यक्ति शुभ कर्मों से शुभ और अशुभ कर्मों से अशुभ फलों को प्राप्त करता है। किंतु इन कर्मों का फल फौरन नहीं मिलता है। शास्त्र कर्म को अलग-अलग अवस्थाओं में बांटती हैं, जिनमें प्रारब्ध कर्म का वह खास भाग है, जो परिपक्व होकर वर्तमान जीवन की परिस्थितियों का निर्धारणकरता है।
आखिर में जो व्यक्ति आज काफी भ्रष्ट या अधर्मी प्रतीत होता है, वह असल में अपने किसी पूर्वजन्म में किए गए महान दान, तपस्या अथवा पुण्यकर्मों से अर्जित शुभ कर्मफल का उपभोग कर रहा होता है।

कलियुग में संपत्ति ही व्यक्ति की श्रेष्ठता का आधार
इस युग में संसार तमोगुण का प्रतीक अज्ञान और रजोगुण का प्रतीक अंधी वासना और लालसा के गहरे प्रभाव में कार्य करता है। विष्णु पुराण में बताया गया है कि, कलियुग में सिर्फ संपत्ति ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा का आधार होगी, धन ही सम्मान और आदर का मुख्य कारण होगा और स्त्री-पुरुष संबंधों का मुख्य आधार सिर्फ आकर्षण और कामना रह जाएगा।
ऐसा इसलिए होगा क्योंकि इस युग की सामाजिक और लौकिक व्यवस्था सच्चाई के अनुरूप नहीं है, इसलिए बेईमानी और अधर्म के रास्ते से प्राप्त किया गए सुख कुछ क्षण मात्र के ही होते हैं। लेकिन शास्त्र इस बात पर जोर देता है कि, यह भौतिक सफलता असल में माया का जाल है, जिसका उद्देश्य सच्चे धर्मनिष्ठ लोगों की परीक्षा लेना है, ताकि वे मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में संघर्ष के बीच सच्चाई, धर्म और चरित्र की रक्षा कर सकें।
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