मंदिर जाना या व्रत रखना नहीं, प्रेमानंद महाराज के अनुसार यह है ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा!
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि मन, वचन और कर्म से किसी को दुख न पहुंचाना ही सबसे बड़ी पूजा है। ...और पढ़ें

भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है? प्रेमानंद महाराज से जानिए

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कभी आपने सोचा है कि, सबसे बड़ी पूजा क्या है? एक ऐसा सवाल जो लगभग हर उस इंसान के मन में एक न एक बार जरूर आता है, जो ईश्वर से जुड़ना चाहता है।
हममें से ज्यादातर लोग मंदिरों में घंटों पूजा, जप-पत, प्रार्थना, कठिन व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं, लेकिन क्या वाकई ये भगवान के समीप जाने का एकमात्र तरीका है? वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने इस सवाल का बड़ी ही सादगी और सरलता से जवाब दिया।
भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है?- प्रेमानंद महाराज
प्रेमानंद महाराज अपने प्रवचन के दौरान कई लोगों के मन की शंका को दूर करने में मदद करते हैं। महाराज जी से अपने उत्तर पाने के बाद भक्त भी संतुष्ट दिखाई देते हैं। प्रेमानंद महाराज से जब एक भक्त ने सवाल करते हुए पूछा कि, भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है?
भक्त के सवालों का जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि, व्यक्ति को किसी को भी मन, शरीर और वाणी से दुख नहीं पहुंचाना चाहिए और यही भगवान की सबसे बड़ी पूजा है। न हम वाणी से कुछ ऐसा बोले जो किसी को दुख पहुंचे, न शरीर से हम किसी के साथ हिंसा करें और न ही मन से किसी को दुख पहुंचाने की कोशिश करें, यही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है।
महाराज जी श्रीरामचरित मानस की एक चौपाई के माध्यम से समझाते हुए कहते हैं कि,
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
अर्थ- दूसरों की भलाई करने के समान सृष्टि में कोई दूसरा धर्म नहीं है। और दूसरों को कष्ट पहुंचाने या दुख देने से कोई भी बड़ा अधर्म या पाप नहीं है।
भलाई से बड़ी कोई पूजा नहीं
कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि, अगर आप किसी को वाणी, मन या शरीर से कष्ट पहुंचाने की कोशिश करते हैं, तो चाहे आप कितना ही गंगा नहा लें या पूजा कर लें, ईश्वर की आपकी भक्ति से कभी खुश नहीं होगा।
वही आप वाणी, शरीर या मन से किसी का भला करते हैं, तो बिना पूजा-पाठ किए भी ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहेगी। इसलिए ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा दूसरों की भलाई करना है।
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