Holika Dahan 2026: प्रदोष काल में ही क्यों जलनी चाहिए होली? नोट करें चंद्र ग्रहण का सटीक समय
जानें क्यों ज्योतिष शास्त्र में प्रदोष काल को होलिका दहन के लिए सबसे शुभ माना गया है। चंद्र ग्रहण के कारण दहन के समय में क्या बदलाव हुए हैं। ...और पढ़ें

होलिका दहन के लिए प्रदोष काल क्यों है शुभ? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, होलिका दहन का पर्व केवल तिथि पर नहीं, बल्कि नक्षत्र और समय के सूक्ष्म गणित पर आधारित होता है। शास्त्रों में प्रदोष काल को होलिका दहन के लिए सबसे शुभ समय माना गया है। प्रदोष काल वह समय होता है जब दिन ढल रहा होता है और रात की शुरुआत हो रही होती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलिका दहन के लिए तीन बातों का मिलना बहुत जरूरी है पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा का साया न हो। यदि इन तीनों का उचित तालमेल न बैठे, तो पूजा के पूर्ण फल मिलने में आशंका बनी रहती है।
प्रदोष काल का आध्यात्मिक महत्व
प्रदोष काल को महादेव की आराधना का सबसे शक्तिशाली समय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय शिव और शक्ति का मिलन होता है, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। होलिका दहन के लिए इस समय को चुनने का मुख्य कारण यह है कि यह संधि काल होता है, जो बुराई के अंत और अच्छाई के उदय का प्रतीक है।
प्रदोष काल में जलाई गई अग्नि को अत्यंत पवित्र माना जाता है, जो घर और मन की नकारात्मकता को भस्म करने की शक्ति रखती है। यही कारण है कि पंचांग में प्रदोष काल की उपस्थिति को देखकर ही दहन का समय तय किया जाता है।
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3 मार्च 2026: प्रदोष काल का समय
सूर्यास्त: शाम 06:22 बजे
प्रदोष काल प्रारंभ: शाम 06:22 बजे से
प्रदोष काल समाप्त: रात 08:46 बजे तक
ज्योतिषीय गणित और भद्रा का त्याग
होलिका दहन में सबसे बड़ी बाधा 'भद्रा' होती है। शास्त्रों का नियम है कि यदि प्रदोष काल में भद्रा का साया हो तो दहन नहीं करना चाहिए। इस साल 3 मार्च 2026 को शाम के समय भद्रा का साया नहीं है, जो एक बहुत ही शुभ संभावना है।

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ज्योतिषीय गणित के अनुसार, भद्रा मुख का त्याग करके प्रदोष काल में ही दहन करना शास्त्र सम्मत है। यदि प्रदोष काल में दहन न किया जाए, तो वह दोषपूर्ण माना जाता है। सही समय पर पूजा का संचालन करने से ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती है और जीवन में सहजता आती है।
पूर्णिमा तिथि और प्रदोष का मेल
होलिका दहन हमेशा फाल्गुन पूर्णिमा को होता है, लेकिन गणित तब जटिल हो जाता है जब पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल से पहले ही समाप्त हो जाए। इस वर्ष 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि शाम 05:07 बजे समाप्त हो रही है, जबकि प्रदोष काल सूर्यास्त शाम 06:22 के बाद शुरू होगा।
ऐसी स्थिति में 'शास्त्र मत' कहता है कि जिस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा का आंशिक प्रभाव भी हो या तिथि का मान रहा हो, उसी दिन दहन करना चाहिए। लेकिन इस बार चंद्र ग्रहण का साया होने के कारण शाम 06:47 के बादस ही दहन करना उचित रहेगा।
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लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए hello@astropatri.com पर संपर्क करें।