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    जब मां कामाख्या के गुस्से से समुद्र की गहराइयों में बंध गए थे भगवान विष्णु, ऐसे मिली थी मुक्ति

    Updated: Sat, 27 Jun 2026 12:00 PM (GMT+05:30)

    कल्कि पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने नीलाचल पर्वत पर मां कामाख्या का अपमान किया, जिसके बाद देवी ने उन्हें और गरुड़ को अपनी माया से बांध दिया। ...और पढ़ें

    मां कामाख्या ने बांध दिया था भगवान विष्णु को (Picture Credit- AI Generated)

    मां कामाख्या ने बांध दिया था भगवान विष्णु को (Picture Credit- AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। असम में स्थित मां कामाख्या का मंदिर भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती की पौराणिक कथा से गहराई से जुड़ी है। आम मंदिरों के विपरीत मां कामाख्या के इस मंदिर में शक्ति पीठ में उनकी पूजा होती है।

    कहा जाता है कि, इस स्थान पर माता सती की योनि का हिस्सा गिरा था। मां कामाख्या धाम से जुड़ी यह बातें अधिकतर लोगों को पता है, लेकिन भगवान विष्णु और मां कामाख्या से जुड़ी एक कथा जिसके बारे में काफी कम लोग ही जानते हैं।

    भगवान श्रीहरि का अभिमान और मां कामाख्या से जुड़ी लीला

    कल्कि पुराण के अनुसार, गरुड़ पर सवार होकर आकाश के रास्ते विहार करते हुए भगवान विष्णु ने नीलाचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या के दर्शन किए। पर्वत के पास पहुंचकर उन्होंने देवी का अपमान किया और गरुड़ से कहा, आगे बड़ों, आगे बड़ो।

    मां कामाख्या जो खुद महामाया और सभी सृष्टि की जननी हैं, उन्होंने गरुड़ को पृथ्वी और स्वर्ग के बीच आकाश में ही स्थिर कर दिया। मां कामाख्या की शक्ति के प्रभाव से वे न आगे बढ़ सके, न पीछे लौट सके, मानो पर्वत ने उन्हें बांध लिया हों।

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    गरुड़ को इस तरह बंधा हुआ देखकर भगवान विष्णु गुस्सा हो उठे और उस पर्वत को हटाने की कोशिश किया। उन्होंने दोनों हाथों से उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन सभी लोकों के स्वामी भगवान विष्णु उसे तिल मात्र भी हिला न सके।

    जब मां कामाख्या ने इस दृश्य को देखा कि, समस्त लोकों के स्वामी भगवान विष्णु पर्वत के सामने असहाय हो गए हैं, तो वे गुस्सा हो उठीं। उन्होंने भगवान विष्णु और गरुड़ को एक पवित्र धागे से बांध दिया। इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को कारे समुद्र में रहने वाले एक समुद्री जीव ग्राह के मुंह में डाल दिया, जहां वे समुद्र की गहराइयों में जाकर डूब गए।

    भगवान विष्णु के साथ मां कामाख्या की दिव्य लीला

    वहां महामाया ने भगवान विष्णु को समुद्र की एक शिला से बांध दिया। भगवान विष्णु इससे छुटकारा पाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी, फिर भी वे जल की सतह तक नहीं पहुंच सके। देवी ने उनकी गति और इंद्रियों को स्थिर कर दिया, जिससे वे गरुड़ के साथ समुद्र तल पर एक सामान्य जीव की तरह बंधे रह गए।

    सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्म ने समुद्र की गहराइयों में भगवान विष्णु को देखा, पर उन्हें ऊपर नहीं ला सके। तब इंद्रराज और अन्य देवता भी वहां पहुंचे लेकिन वे भी इसमें असफल रहे। मां कामाख्या की माया से मोहित होकर वे भी वही बंध गए।

    भगवान शिव के हस्तक्षेप से मिला छुटकारा 

    इसके बाद देव गुरु बृहस्पति भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए और उन्होंने पूछा कि भगवान ब्रह्म, विष्णु और अन्य देवता कहां चले गए हैं। तब भगवान शिव ने कहा कि, महामाया की देवी का अनादर की वजह से भगवान विष्णु महामाया के मोह में पकड़कर समुद्र के अंदर स्थित हैं।

    भगवान शिव ने बृहस्पति देव को बताया कि, मदद के लिए गए भगवान ब्रह्मा और अन्य देवता भगवान विष्णु के साथ बंधन में पड़ गए थे। उन्होंने चेतावनी दी कि, जो भी उनके बिना वहां जाएगा, वह भी उसी तरह बंध जाएगा और कभी वापस नहीं लौट सकेगा। इसके बाद भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और अन्य देवताओं को एक-एक करके मुक्त कर दिया।

    भगवान शिव बृहस्पति देवी जी के साथ देवताओं के पास पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने कहा कि, गरुड़ द्वारा नीलकूट पर्वत को हटाने की कोशिश के कारण मां कामाख्या गुस्सा हो गई और उनके कोप से सभी देवता असहाय हो चुके हैं। उन्होंने भगवान शिव से मदद मांगी, वे सभी देवताओं को कामाख्या देवी के पास ले चलें। ताकि सभी देवता उनके दंड से मुक्त हो सकें।

    श्रीविष्णु की करुणा को देखते हुए भगवान शिव ने देवी कामाख्या का दिव्य कवच प्रकट किया। खुद उसे धारण कर वे दा बंधनों से परे रहे। उनके सान्निध्य में बृहस्पति भी मुक्त रहे। भगवान शिव ने कहा, जो इस कवच को धारण करता है, वह भी बंधनमुक्त हो जाता है।

    इस कवच में मां कामेश्वरी के नाम शरीर के हर अंग की रक्षा करते हैं, जबकि उनके बीजाक्षर अस्थियों, धातुओं, शरीर के रसों और सभी दिशों की सुरक्षा करते हैं। इसका एक बार पाठ करने से भय और रोग का नाश होता है। सौ बार पाठ करने से साधक को मां के धाम में दिव्य दर्शन की प्राप्ति होती है। युद्ध के दौरान इसका पाठ करने से बंधन में पड़ा व्यक्ति फौरन मुक्त हो जाता है।

    भगवान विष्णु के साथ मां कामाख्या की दिव्य लीला (1)

    दिव्य कवच धारण किए हुए भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवराज इंद्र और अन्य देवता महामाया की कृपा से समुद्र की गहराइयों से मुक्त होकर बाहर आ गए। इसके बाद सभी ने देवी को प्रणाम कर नीलकूट पर्वत पर पहुंचे।

    मां कामेश्वरी के दर्शन कर भगवान विष्णु ने उनकी स्तुति की। मां कामाख्या आदि शक्ति हैं, जो खुद प्रकृति स्वरूप हैं और जल, पृथ्वी और समस्त सृष्टि का मूल स्रोत भी हैं। वे परम ज्ञान से भरपूर हैं, जो व्यक्ति को मोक्ष प्रदान करती हैं।

    इसके बाद मां कामाख्या भगवान विष्णु के समक्ष प्रकट हुई और बोलीं। उन्होंने भगवान विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवताओं को देवी के पवित्र योनिकुंड के जल में नहाने और उसका आचमन करने का आदेश दिया। मां ने कहा कि, इससे उनके अंदर का अंहकार दूर हो जाएगा और वे गरुड़ पर सावर होकर फिर से स्वर्ग लौट सकेंगे।

    मां कामाख्या की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने उनके योनिकुंड से प्रवाहित पवित्र जल में स्नान किया और उसका आचमन किया। अन्य देवताओं ने भी ऐसा ही किया। अहंकार से छुटकारा पाकर सभी देवता आनंद से भरकर स्वर्ग की ओर लौट गए।

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