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    रावण की खींचतान से कैसे बदल गया शिवलिंग का आकार? गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर की वो कहानी जो कभी नहीं सुनी!

    Updated: Wed, 17 Jun 2026 12:04 PM (IST)

    कर्नाटक के गोकर्ण में स्थित महाबलेश्वर मंदिर को 'दक्षिण का काशी' कहा जाता है, जिसका रहस्य रामायण काल के रावण और गणेश से जुड़ा है। ...और पढ़ें

    गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर, कर्नाटक (AI-Generated Image)

    गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर, कर्नाटक (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. महाबलेश्वर मंदिर को 'दक्षिण का काशी' भी कहा जाता है।

    2. रावण की तपस्या से प्राप्त आत्मलिंग गणेश ने गोकर्ण में स्थापित किया।

    3. भक्त सीधे आत्मलिंग को छूकर पूजा कर सकते हैं।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत में भगवान शिव से जुड़े ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके रहस्य के आगे विज्ञान भी बौना दिखाई देता है। ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के गोकर्ण में स्थित महाबलेश्वर मंदिर, जिसका रहस्य रामायण काल के रावण से जुड़ा है। एक ऐसा मंदिर जिसे दक्षिण का काशी भी कहा जाता है। आइए जानते हैं इस मंदिर के उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कहानी।

    भारत के कर्नाटक राज्य के पश्चिमी तट पर बसा गोकर्ण श्री महाबलेश्वर मंदिर जो भगवान शिव को समर्पित प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। दक्षिण भारत में रहने वाला हिंदूओं के बीच इस मंदिर का काफी महत्व है। माना जाता है कि, मंदिर में स्थापित आत्मलिंग पौराणिक काल से जुड़ा है, जिस वजह से भक्तों के बीच इसकी आस्था ओर बढ़ जाती है।

    गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर

    गोकर्ण आत्मलिंग से जुड़ी पौराणिक कथा (AI Image)

    मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा क्या कहती है?

    प्राचीन और लोक प्रचलित कथाओं के मुताबिक, लंका का राजा और राक्षस कुल से संबंध रखने वाले रावण ने भगवान शिव से ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली आत्मलिंग प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव रावण की कठोर साधना से खुश होकर उसे आशीर्वाद स्वरूप महा बलशाली आत्मलिंग प्रदान किया।

    रावण द्वारा इस दिव्य शक्ति के गलत इस्तेमाल के डर से भगवान गणेश ने एक बालक का रूप लेकर बड़ी चतुराई से आत्मलिंग को गोकर्ण में स्थापित कर दिया। आत्मलिंग के भूमि पर अचल (स्थिर) हो गया। तब से लेकर आज तक भगवान शिव यहां महाबलेश्वर के रूप में निवास करते हैं। इस मंदिर का नाम महाबल से लिया गया है, जिसका मतलब है कि, महान शक्ति, जो आत्मलिंग की दुर्लभ शक्ति का प्रतीक है।

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    गोकर्ण आत्मलिंग की बनावट गाय के कान की तरह

    गोकर्ण आत्मलिंग से जुड़ी एक कथा यह भी प्रचलित है कि, जब भगवान गणेश ने बालक का रूप धारण करके आत्मलिंग को जमीन पर रखा दिया, तो वह वहीं जमीन में धंस गया। रावण ने उस आत्मलिंग को निकालने के लिए पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वह इसमें असफल रहा।

    इस खींचतान के दौरान आत्मलिंग का आकार गाय के कान जैसा (गोकर्ण) की तरह हो गया। मंदिर में स्थापित आत्मलिंग को देखकर कई भक्तों को ऐसा प्रतीत होता है।

    जहां अन्य मंदिरों में भक्त भगवान के दर्शन दूर से ही करता है, वहीं यहां भक्तों को आत्मलिंग को सीधा छूने, प्रार्थना करने और खुद आशीर्वाद प्राप्त करने की अनुमति दी जाती है। यह दुर्लभ विशेषाधिकार कहीं न कहीं अन्य मंदिरों की तुलना में पवित्र बनाता है।

    गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर  (1)

    गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर और आत्मलिंग

    गोकर्ण गणेश मंदिर का महत्व

    महाबलेश्वर मंदिर के समीप ही श्री महा गणपति मंदिर भी स्थित है, जो भगवान गणेश को पूर्ण रूप से समर्पित है। गोकर्ण में आत्मलिंग बनाए रखने के लिए भगवान गणेश ने खास भूमिका अदा की थी। यहां आने वाले तीर्थयात्री महाबलेश्वर मंदिर में प्रवेश करने से पहले यहां प्रार्थना करते हैं, जो गणेश की दिव्य हस्तक्षेप का प्रतीक है।

    वाराणसी के काशी की ही तरह दक्षिण भारत के गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर समुद्री तट के पास अस्थि विसर्जन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भारत भर से आन वाले परिवार यहां अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करते हैं। मान्यता है कि, काशी की ही तरह यहां पर अंतिम संस्कार करने से जीवात्मा को पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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