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    सिर की जगह खिला है कमल, जानिए बिना चेहरे वाली रहस्यमयी देवी 'लज्जा गौरी' का इतिहास

    Updated: Fri, 05 Jun 2026 10:34 AM (IST)

    लज्जा गौरी एक रहस्यमयी भारतीय देवी हैं जिनका चेहरा नहीं, बल्कि सिर पर कमल का फूल होता है। इन्हें जीवन की उत्पत्ति, मातृत्व और सृजन शक्ति का प्रतीक मान ...और पढ़ें

    कौन हैं लज्जा गौरी देवी? (Image Source: AI-Generated)

    कौन हैं लज्जा गौरी देवी? (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. चेहरे की जगह कमल फूल वाली रहस्यमयी देवी।

    2. जीवन की उत्पत्ति और मातृत्व का प्रतीक।

    3. संतान प्राप्ति और समृद्धि के लिए पूजी जाती हैं।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी किसी ऐसी भारतीय देवी का नाम सुना है, जिनका कोई चेहरा नहीं हैं, बल्कि सिर के स्थान पर एक खिला हुआ कमल का फूल है। इस देवी का नाम है लज्जा गौरी जो भारतीय इतिहास और मूर्तिकला की बेहद खास और रहस्यमयी देवी हैं। प्राचीन काल से ही इन्हें सिर्फ एक मूर्ति नहीं बल्कि जीवन की उत्पत्ति, मातृत्व और धरती की सृजन शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं बिना चेहरे वाली इस रहस्यमयी देवी लज्जा गौरी के बारे में।

    एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, लज्जा गौरी देवी सनातन परंपरा की एक प्राचीन, रहस्यमयी और दुर्लभ देवी हैं, जिनकी पूजा विशेष रूप से गुप्त और तांत्रिक पद्धतियों में की जाती रही है। कला और मूर्तिकला में इन्हें 'कमल-शीर्ष देवी' के रूप में दर्शाया जाता है, यानी इनके धड़ पर मानवीय चेहरे की जगह एक खिला हुआ कमल का फूल होता है।

    लज्जा गौरी देवी किसका प्रतीक

    देवी को प्रसव की मुद्रा में बैठा हुआ दिखाया जाता है, जो इस ब्रह्मांड के सृजन और उत्पत्ति का मुख्य प्रतीक है। लज्जा गौरी को आदि शक्ति, प्रकृति की जननी और प्रचुरता की देवी माना जाता है। मां की पूजा विशेष रूप से संतान प्राप्ति, अच्छी फसल और जीवन में अटूट समृद्धि के लिए की जाती है।

    लज्जा गौरी देवी की मूर्तियां मुख्य रूप से भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में देखने को मिलती है। इसके अलावा सिंधु घाटी सभ्यता के समय से लेकर मध्यकाल तक इनकी मूर्ति पाई गई हैं।

    लज्जा गौरी प्राचीन ग्रंथों में इनके लिए अदिति, दिग्वासा, कोट्टावी और रेणुका जैसे नामों का जिक्र देखने को मिलता है। लज्जा शब्द इसे संकोच के अर्थ में नहीं, बल्कि उस परम सृजनशीलता और गोपनीयता से जोड़ा जाता है। इन्हें शिव की शक्ति का ही एक आदिम स्वरूप माना जाता है।

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    लज्जा देवी गौरी

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    सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

    लज्जा गौरी की पूजा खास तौर से ग्रामीण और आदिवासी समाजों में लोक देवी के रूप में शुरू हुई, जो बाद में मुख्यधारा के हिंदू धर्म (शाक्त परंपरा) में घुल मिल गई। चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों के समय में इनकी पूजा काफी प्रसिद्ध थी।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।