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    जब बार-बार किस्मत से हो शिकायत, तो श्रीराम के जीवन से जुड़ी ये घटनाएं बदल देंगी आपके सोचने का नजरिया

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 04:30 PM (GMT+05:30)

    जीवन की चुनौतियों में जब मन उदास हो, तो प्रभु श्रीराम के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। उनके आदर्श हमें क्षमा, धैर्य और सेवाभाव से जीने की कला सिखाते हैं ...और पढ़ें

    श्री राम जी की प्रेरणादायक घटना (Picture Credits- AI Image)

    श्री राम जी की प्रेरणादायक घटना (Picture Credits- AI Image)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे साथ ऐसा कई बार होता है, जब जीवन में चीजें साथ नहीं देती हैं, तो मन काफी उदास हो जाता है। किसी भी काम को करने का मन नहीं करता और बार-बार हम अपनी किस्मत को कोसते हैं कि, 'मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?' जबकि हम भूल जाते हैं कि, जीवन में घटने वाली परिस्थितियां सदैव एक जैसी नहीं होती हैं।

    अच्छा और बुरा दोनों समय मनुष्य को सिखाने के लिए आते हैं कि, चीजें हमेशा एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं करती हैं। जो भी लोग बार-बार अपनी किस्मत को कोसते या हमेशा अपनी तुलना दूसरों से करके दुखी होते हैं, उन्हें प्रभु श्रीराम के जीवन से सीख लेनी चाहिए। जब लगे जीवन में काफी उलझने हैं, जिनसे पार पाना मुश्किल है, तब श्रीराम जी की इन बातों को याद कर लेना।

    क्षमा करना सीखें

    वाल्मीकि रामायण में जब कैकेयी ने श्रीराम से राज्य शासन का हक छीन लिया और उन्हें 14 सालों के लिए वन में भेज दिया, तभी प्रभु श्रीराम ने कभी भी उनके प्रति गुस्सा, कटुता या द्वेष भाव नहीं रखा। वनवास से लौटने के बाद भी उन्होंने कैकयी का उसी तरह से सम्मान किया, जैसे पहले करते थे।

    सीख- दूसरे आपके साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, यह उनका कर्म है। लेकिन आप उस गुस्से की प्रतिक्रिया कैसे देते हैं यह आपका धर्म और कर्म है।

    सफलता का श्रेय बांटना सीखें

    लंका विजय करने के बाद श्रीराम ने कभी भी यह नहीं कहा कि, उन्होंने अकेले इस युद्ध को जीता। उन्होंने इस विजय का श्रेय हनुमान, सु्ग्रीव, जाम्बवान, अंगद और पूरी वानर सेना के योगदान का सम्मान किया और सभी को विजय का भागीदार बनाया।

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    सीख- महान लोग सफलता का श्रेय कभी भी अकेले नहीं लेते हैं। वे हर उस इंसान का सम्मान करते हैं, जिसने उनकी यात्रा को सरल बनाया।

    नेतृत्व से पहले सेवा करना सीखें

    अयोध्या वापस आने के बाद श्रीराम ने अपने राज्य में ऐसा शासन स्थापित किया, जिसमें प्रत्येक प्रजा का सुख और न्याय पहले था। इसी आदर्श के कारण उनके शासन को रामराज्य कहा जाता है।

    सीख- सच्चा नेता वह नहीं, जो शासन करें, बल्कि वह है जो लोगों की सेवा करना जानता है।

    धैर्य रखना सीखें

    माता सीता के हरण होने के बाद श्रीराम ने गुस्से में आकर बिना योजना के लंका पर आक्रमण नहीं किया। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की, हनुमान जी को सीता खोज का दायित्व सौंपा और वानर सेना इक्ट्ठा की और सही समय आने पर ही युद्ध किया।

    सीख- अक्सर भावनाओं में आकर लिया गया फैसला गलत होता है। श्रीराम सिखाते हैं कि धैर्य और सही समय का इंतजार ही सफलता की असल कुंजी है।

    संकट में दूसरों का सहारा बनें

    वनवास के दौरान भी श्रीराम सिर्फ अपने दुख में नहीं डूबे, बल्कि उन्होंने ऋषियों की रक्षा की, सु्ग्री की मदद की और अनेक लोगों के जीवन में आशा की किरण बनकर उभरे।

    सीख- महान लोग अपने दुख से ऊपर उठकर दूसरों के जीवन में प्रकाश बनने का काम करते हैं।

    किसी को छोटा मत समझो

    अयोध्या के राजा श्रीराम ने माता शबरी के जूठे बेर बड़ी ही सरलता और प्रेम से स्वीकार किए थे। खुद भगवान विष्णु के अवतार होते हुए भी उन्होंने वानरों को अपना साथी बनाया और उन्हीं के साथ मिलकर धर्म की विजय हासिल की।

    सीख-सच्ची महानता वही है, जो किसी को छोटा महसूस न कराए और हर मन में ईश्वर के अंश को समझ पाए।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।