शिव जी के गले में नाग और हाथ में डमरू का क्या है संबंध? यहां पढ़ें पुराणों में लिखा सच
भगवान शिव के त्रिशूल, डमरू और नाग धारण करने के पीछे गहरा रहस्य है। ये प्रतीक जीवन में संतुलन, ब्रह्मांड ...और पढ़ें

भगवान शिव क्यों धारण करते हैं त्रिशूल, डमरू और नाग? (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव का स्वरूप सभी देवी-देवताओं से अलग है। जहां अन्य देवता स्वर्ण और रत्नों के आभूषण को पहनते हैं। वहीं, भगवान शिव शृंगार के रूप में त्रिशूल, डमरू और नाग धारण करते हैं। इन आभूषणों को धारण करने का बेहद खास महत्व है। महादेव के इन आभूषण में कई रहस्य छिपे हुए हैं।
क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव त्रिशूल, डमरू और नाग का क्या संबध है। अगर नहीं पता, तो आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं इसके पीछे की वजह के बारे में।
त्रिशूल- महादेव के त्रिशूल को सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है। यह शत्रुओं का नाश करता है। त्रिशूल से यह सीख मिलती है कि जीवन में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर संतुलन होना चाहिए। जब व्यक्ति जीवन में अहंकार का त्याग कर देता है, तो भगवान शिव को प्राप्त कर लेता है। ऐसा माना जाता है कि त्रिशूल को धारण करने से बुराइयों और अहंकार का नाश होता है, जिससे व्यक्ति को जीवन में आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा मिलती है।

डमरू- भगवान शिव के डमरू को ब्रह्मांड की उत्पत्ति और लय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, डमरू को सृष्टि का पहला वाद्य यंत्र माना जाता है। डमरू को बजाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और आसपास का वातावरण शुद्ध होता है। जब भगवान शिव ने पहली बार डमरू बजाया था, तो उस से ध्वनि से संपूर्ण ब्रह्मांड, संगीत के स्वर की उत्पति हुई थी।
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नाग- सांप को विष, क्रोध और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव अपने गले में नाग देवता को धारण करते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि शिव जी ने क्रोध, वासना और ईर्ष्या को अपने काबू में कर लिया है। वासुकि भगवान शिव के परम भक्त हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान नागराज वासुकि की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें आभूषण के रूप में स्थान दिया, जिसके बाद से ही भगवान शिव आभूषण के रूप में अपने गले में नाग देवता को धारण किए हुए हैं।
पुराणों में मिलता है वर्णन
भगवान शिव के त्रिशूल, डमरू और नाग का विस्तार से वर्णन शिवपुराण और विष्णु पुराण में मिलता है।
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