'महाकाली' में शुक्राचार्य के अवतार में दिखेंगे अक्षय खन्ना: पढ़ें असुरों के गुरु की अनसुनी कहानी
अक्षय खन्ना 'महाकाली' फिल्म में शुक्राचार्य का किरदार निभाएंगे, जो हिंदू महाकाव्य में एक महत्वपूर्ण गुरु हैं। उन्होंने असुरों को ...और पढ़ें

गुरु शुक्राचार्य की पौराणिक कथा

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धुरंधर फिल्म में अपनी दमदार एक्टिंग के बाद बॉलीवुड एक्टर अक्षय खन्ना 'महाकाली' फिल्म में शुक्राचार्य के एक बिल्कुल अलग अवतार में बड़े पर्दे पर वापसी करने जा रहे हैं। हिंदू महाकाव्य में शुक्राचार्य की भूमिका काफी प्रमुख रही है। महर्षि भृगु और माता काव्या के पुत्र गुरु शुक्राचार्य हिंदू धर्म के महान ऋषियों में शामिल है।
भगवान शिव द्वारा आशीर्वाद प्राप्त एक महान ज्ञानी ऋषि, लेकिन इसके बाद भी उन्हें देवताओं से वह मान-सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे। खुद को अपमानित महसूस करते हुए उन्होंने असुरों के गुरु औपे मार्गदर्शक बनने का रास्ता चुना। गुरु शुक्राचार्य ने ही असुरों को युद्ध, रणनीति और शस्त्र विद्या की शिक्षा दी।
शुक्राचार्य किसका प्रतीक?
महाभारत महाकाव्य में इसका उल्लेख मिलता है कि, शुक्राचार्य ने अपना सम्मत जीवन ध्यान और देवताओं को खुश करने के प्रयासों में बिताया। इसके अलावा उन्होंने कई मंत्र, रस और औषधियां भी बनाईं जिन्हें उन्होंने अपने शिष्यों को विरासत में दिया।
वैदिक ज्योतिष में गुरु शुक्राचार्य नवग्रहों में से एक है, जिन्हें शुक्र ग्रह कहा जाता है। इनका शासन वृषभ और तुला राशि पर है। इसके अलावा शुक्र ग्रह को स्त्रीत्व, सौंदर्य, रोमांस, प्रजनन, कला और आनंद का प्रतीक माना जाता है।
दैत्य गुरु शुक्राचार्य की कथा
अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए शुक्राचार्य ने महान ऋषि अंगिरस से बृहस्पति (ऋषि अंगिरस के पुत्र) के साथ शिक्षा हासिल करना शुरू किया। लेकिन उन्हें ऐसा महसूस किया कि महर्षि अंगिरस अपने पुत्र बृहस्पति को उनसे ज्यादा स्नेह और ज्ञान देते हैं। इसलिए उन्होंने आश्रम छोड़ दिया और ऋषि गौतम से शिक्षा हासिल करना शुरू कर दिया।
गुरु शुक्राचार्य की पत्नी ऊर्जास्वती से उनके चार पुत्र हुए, जिनका नाम चंदा, अमरका, त्वस्त्र और धरात्र था। उनकी दूसरी पत्नी जयंती जो इंद्र के पुत्री थी, उनका नाम देवयानी था।

शुक्राचार्य की माता की मृत्यु
ऋषि भृगु की पत्नी मन से उत्पन्न हुई एक शक्तिशाली तपस्वी थीं। देवी भागवत पुराण में देवों और असुरों के बीच हुए युद्ध का उल्लेख है। यु्द्ध में देव असुरों पर जीत हासिल कर लेते हैं। इसलिए देवताओं से अपनी सुरक्षा के लिए असुर ऋषि भृगु के आश्रम में गए। लेकिन ऋषि भृगु और शुक्राचार्य वह मौजूद नहीं थे, उनकी जगह देवी काव्यामाता थीं।
असुरों ने काव्यामाता से रक्षा का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने अतिथि धर्म के रूप में मन से स्वीकार किया। एक शक्तिशाली अदृश्य ऊर्जा कवच आश्रम को बाहरी खतरों से बचाने का काम करती है, जिसे देवता भी भेदने की हिम्मत नहीं कर सकते थे।
सभी देवताओं की कोशिशें विफल रही। तब वे भगवान विष्णु से मदद मंगाने गए। ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने दिव्य अस्त्र सुदर्शन चक्र का आदेश दिया, जिसने सुरक्षा कवच को तोड़कर काव्यामाता का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब महर्षि भृगु को इस बात का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि, वे पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लें और अपनी पत्नी से अलग होने का दर्द महसूस करेंगे। जब शुक्राचार्य को अपनी माता की मृत्यु की खबर मिली तो वह देवताओं से घृणा करने लगे और असुरों के बीच विष्णु जी की पूजा को निषेध कर दिया।

शिव ने दिया संजीवनी मंत्र
असुरों की हार से गुस्से में आकर शु्क्राचार्य ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। वे हजारों सालों तक उल्टा लटके रहे। शुक्राचार्य की तपस्या के बारे में जानकार इंद्र ने अपनी पुत्री जयंती को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा। परंतु जयंती भी अपनी कोशिशों में सफल नहीं हो पाई।
ऋषि शुक्राचार्य की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया। शुक्राचार्य ने संजीवनी मंत्र का ज्ञान मांगा, जो मरे हुए को फिर से जिंदा कर सकता है। हालांकि भगवान शिव ने जाने से पहले चेतावनी दी कि वे इसका इस्तेमाल गलत कामों में नहीं करेंगे। संजीवनी मंत्र सहायता के लिए है, लेकिन असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने इस मंत्र का इस्तेमाल दैत्यों को पुनर्जीवित करके देवताओं के खिलाफ युद्ध के लिए किया।
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