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    Mahashivratri 2026: कैसे हुआ शिव-शक्ति का मिलन? पढ़ें अटूट प्रेम और कठोर तप की कथा

    Updated: Mon, 02 Feb 2026 04:00 PM (IST)

    महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) शिव और शक्ति के महामिलन का उत्सव है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शि ...और पढ़ें

    Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि कथा। ( Ai Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Mahashivratri 2026: हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के महामिलन का उत्सव है। यह कथा त्याग, अटूट विश्वास और युगों-युगों के इंतजार की है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर देवों के देव महादेव ने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। आइए जानते हैं, कैसे शिव-शक्ति का विवाह हुआ?

    Mahashivratri katha 1

    (Ai Generated)

    सती का वियोग और शिव का वैराग्य

    देवी सती अपने पिता दक्ष द्वारा शिव जी का अपमान नहीं सह पाईं थीं, जिसके चलते उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे। सती के वियोग में शिव जी ध्यान में चले गए और संसार से दूर होकर हिमालय में समाधिस्थ हो गए थे। शिव के बिना शक्ति अधूरी थी और शक्ति के बिना संसार का संतुलन बिगड़ने लगा था।

    देवी पार्वती का जन्म

    देवी सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। पार्वती बचपन से ही महादेव की परम भक्त थीं। जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, उनका संकल्प दृढ़ होता गया कि वे केवल महादेव से ही विवाह करेंगी। जब नारद मुनि ने उन्हें बताया कि महादेव को पाने का एकमात्र रास्ता कठिन तप है, क्योंकि समाधि में लीन भोलेनाथ को सिर्फ भक्ति से ही जगाया जा सकता है।

    अपर्णा नाम का रहस्य

    माता पार्वती ने सभी सुखों का त्याग कर दिया और हिमालय में तपस्या करने चली गईं। हजारों सालों तक उन्होंने केवल फल-फूल खाकर समय बिताया। फिर कई सालों तक केवल जल का सेवन किया। कुछ समय तक देवी ने सूखे पत्ते भी खाएं थे, लेकिन बाद में उन्होंने पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया। इसलिए उन्हें 'अपर्णा' कहा गया। उनकी तपस्या से महादेव ध्यान से उठ गए, लेकिन उन्होंने पार्वती की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

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    महामिलन

    भगवान शिव ने एक ब्राह्मण का रूप लिया और पार्वती के पास जाकर अपनी निंदा करने लगे। उन्होंने कहा, "वह श्मशान निवासी, गले में सर्प लपेटने वाला औघड़ तुम्हारे योग्य नहीं है।" यह सुनकर माता पार्वती बहुत क्रोधित हो गईं और उन्होंने यह साफ कर दिया कि उनका प्रेम किसी बाहरी रूप पर नहीं, बल्कि शिव के आत्मस्वरूप पर आधारित है। देवी पार्वती का भाव देखकर महादेव अपने असली स्वरूप में प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

    महाशिवरात्रि विवाह उत्सव

    फाल्गुन महीने के कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान शिव एक अनोखी बारात लेकर माता पार्वती के द्वार पहुंचे, जिसमें देवता, गंधर्व, भूत-प्रेत और नंदी आदि शामिल हुए थे। इसी दिन शिव और शक्ति का विवाह संपन्न हुआ।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।