वह दासी जिसके मैले कपड़े धोने धरती पर आईं साक्षात मां लक्ष्मी, और श्री हरि ने पीसी चक्की!
भक्त शिरोमणि माता जनाबाई की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण स्वयं उनके लिए चक्की पीसते थे और कपड़े धोते थे। ...और पढ़ें
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कौन थी जनाबाई जिसके सेवा खुद भगवान करते थे? (Picture Credits- AI Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब-जब भगवान कृष्ण के परम भक्तों का नाम लिया जाएगा, तब तब भक्त शिरोमणि माता जनाबाई का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाएगा। कहा जाता है कि, माता जनाबाई की भक्ति में ऐसी अलौकिक शक्तियां थी कि खुद भगवान कृष्ण के विट्ठल स्वरूप उनके लिए चक्की चलाते थे।
खास बात यह है कि, माता जनाबाई ने कभी भी भगवान से सहायता नहीं मांगी, न ही उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण चक्की चलाने आते थे, बल्कि कहा जाता है कि, अपनी अनन्य भक्त से मिलने के लिए खुद ठाकुर जी अपनी इच्छा से दौड़े चले आते थे। आइए जानते हैं भक्त शिरोमणि जनाबाई की उस पावन और पवित्र कथा के बारे में जिनके घर भगवान खुद चक्की चलाने आते थे।
माता जनाबाई कौन थीं?
जनाबाई एक सामान्य जीवन जीने वाली साधारण सी सेविका थीं। वह प्रसिद्ध संत नामदेव जी के निवास स्थल में दासी का काम करती थीं। रोजाना पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन-कपड़े धोना और चक्की पीसना उनका काम था।
वहीं, संत नामदेव के घर में आए दिन भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप विट्ठल देव जी का भजन कीर्तन होता था। धीरे-धीरे जनाबाई इस भक्ति के ओर आकर्षित हो गई। माता जनाबाई प्रभु की भक्ति में ऐसी डूबी की मन और प्राणों के द्वार दोनों खुल गए। जनाबाई के मुख से ही नहीं, बल्कि उनके रोम-रोम में भी भगवान के नाम का उच्चारण होने लगा था।
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जनाबाई के लिए महामाया ने धोए कपड़े
कहा जाता है कि, एक बाद एकादशी के मौके पर संत नामदेव जी के घर में भारी भक्तमंडली जमा हुई थी। पूरी रात भगवान विट्ठल के नाम का भजन-कीर्तन चलता ही रहा। दिन भर व्रत के चलते जनाबाई ने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया था। पूरी रात भक्तजन कीर्तन करते रहे और मां जनाबाई एक कोने में बैठकर प्रेमाश्रु (प्रेम के आंसू) बहाती रहीं।
जब सुबह भजन-कीर्तन खत्म हुई तो, सभी लोगों की तरह जनाबाई भी अपने घर लौट आईं। पूरी रात की थकान के कारण अगले दिन उन्हें उठने में काफी समय हो गया। जब आंखें खुली तो वह फौरन उठीं और जल्द ह नित्यकर्म से निवृत्त होकर संत नामदेव के घर गई।
संत नाम देव के घर पहुंचते ही उन्होंने झाड़ू लगाने के बाद बर्तन मांजकर कपड़े धोने के लिए पास के ही चंद्रभागा नदी के किनारे जा पहुंचीं। कपड़े धोने के दौरान उन्हें याद आया कि, जिस कमरे में कीर्तन होता है, उसे व्यवस्थित करना तो भूल गई। कपड़े पानी में डुबाए जा चुके थे, इस वजह से उन्हें छोड़कर फौरन जाना भी संभव नहीं था। जनाबाई का मन अपने आराध्य के कमरे की व्यवस्था न कर पाने के कारण भर आया।
कहते हैं कि, भक्तों की मन की पीड़ा भगवान तक तुरंत पहुंच जाती है और वह अपने भक्त की व्याकुलता दूर करने के लिए तत्काल कोई व्यवस्था नहीं करते हैं। जनाबाई चिंता में बैठी थीं, कि तभी एक बूढ़ी महिला वहां आ पहुंची। उन्होंने कहा, बेटी किस चिंता में डूबी हो? जनाबाई ने अपनी सभी परेशानी बता दी।
बूढ़ी महिला ने मुस्कुराकर बोला- तुम कीर्तन का कमरा व्यवस्थित कर आओ, तब तक मैं कपड़े धो देती हूं। जनाबाई इतनी जल्दी में थी कि, उन्होंने पल भर के लिए भी नहीं सोचा कि, आखिर ये बूढ़ी महिला कौन है और उसके मन की बात कैसे जान ली।
जब जनाबाई कमरा व्यवस्थित करके वापस लौटीं तो उन्होंने देखा कि, कपड़े धूल कर सूख रहे थे। यह चमत्कार देख जनाबाई काफी हैरान हो गई। वह फौरन उस बूढ़ी महिला के पीछे दौड़ी उन्हें रोकने के लिए, लेकिन रास्ते में ठोकर वह गिर गई। कुछ देर के लिए उनकी नजर ओझल हुई वह बूढ़ी महिला गायब हो गई। लेकिन वहां गिली मिट्टी पर उसके दिव्य पैरों के निशान बने हुए थे।

जब जनाबाई ने यह अद्भुत घटना संत नामदेव और अन्य संतों को बताई, तो सभी ने उन चरण चिह्नों के दर्शन किए। मंडली के बड़े संत पहचान गए कि, ये तो साक्षात महामाया (मां लक्ष्मी) के पांव निशान हैं। नामदेव जी भावुक होकर बोले, जनाबाई तुम धन्य हो, जिसके लिए खुद महामाया ने दासी बनकर कपड़े धोए।
जब भगवान विट्ठल पीसने लगे चक्की
इस घटना के बाद जनाबाई की दशा बदल गई। वह भक्ति में इतनी लीन हो गई कि, उनके रोम-रोम में हर भक्त पवित्र भगवत नाम की ऊर्जा प्रवाहित होने लगी। घर के काम करते-करते जनाबाई व्याकुल होने लगती और अपनी सुध-बुध खो देती थीं। नटखट नागर भगवान विट्ठल इसी समय के इंतजार में झाड़ू लगाने के साथ चक्की पीसने लगते थे।
इन्हीं दिव्य घटनाओं का उल्लेख करते हुए मराठी संतों और कवियों ने लिखा है कि, जनी संग दलिल यानी भगवान खुद जनाबाई के साथ चक्की पीसते थे।
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