जगत के नाथ को सुबह-सुबह क्यों परोसी जाती है बिना आलू-टमाटर वाली सादी खिचड़ी? वजह कर देगी इमोशनल
भगवान जगन्नाथ को प्रतिदिन सबसे पहले खिचड़ी का भोग क्यों लगाया जाता है, इसके पीछे माता करमाबाई और भगवान श्रीकृष्ण की एक पौराणिक कथा है। ...और पढ़ें

भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी भोग लगाने से जुड़ी कथा (Picture Credits- AI Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान जगन्नाथ को रोजाना सबसे पहले खिचड़ी का भोग लगता है। लेकिन कभी सोचा है कि जगत के नाथ को रोजाना सबसे पहले सामान्य सी खिचड़ी का ही भोग क्यों लगाया जाता है? इसके पीछे एक दिल छू लेने वाली पौराणिक कथा है। हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि, हरि अनंत हरि कथा अनंता यानी ईश्वर की महिमा इतनी असीम है कि, कोई भी व्यक्ति या संत उनकी महिमा का बखान नहीं कर सकता।
बहुत समय पहले भगवान श्रीकृष्ण की परम उपासक माता करमाबाई जी भगवान के बाल रूप को अफने पुत्र की तरह मानती थी। वह जगन्नाथ पुरी के नजदीक ही एक कुटिया बनाकर रहती थीं। ठाकुरजी के बाल स्वरूप से ऐसे बात करती थीं जैसे बिहारी जी सच में उनके पुत्र हों और उनके घर में ही वास करते हैं। भगवान भी करमाबाई के इस निश्चल प्रेम के वश में थे।
जब भगवान ने पहली बार चखा खिचड़ी का स्वाद
एक दिन माता करमाबाई की इच्छा हुई कि, ठाकुर जी को फल या मेवे की जगह हाथ से बना सादा और पौष्टिक अहार बनाकर खिलाएं। उन्होंने प्रभु से यह बात बता दी। भगवान भाव के भूखे उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, माता जो भी बनाया हो वही खिला दो, आज काफी तेज भूख लगी है।
करमाबाई ने साधारण सी खिचड़ी बनाई थी। उन्होंने फौरन ठाकुर जी को गरमा-गरम खिचड़ी परोस दी। भगवान ने भी बड़े आनंद के साथ खिचड़ी खाई। करमाबाई जी ममता के अधीन होकर ठाकुर जी को पंखा झलने लगीं कि कहीं गरम खिचड़ी से ठाकुर जी का मुंह न जल जाए। भगवान ने जब खिचड़ी खा ली तो, तृप्त होकर कहा- मुझे तो यह खिचड़ी काफी अच्छी लगी। मेरे लिए रोजाना सुबह उठकर खिचड़ी ही बनाओ करो।
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अब करमाबाई रोजाना सुबह उठकर बिना किसी बाहरी आंडबर के सबसे पहले खिचड़ी बनाती। भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में सुबह-सुबह दौड़े चले आते और आते ही कहते- 'मैय्या मुझे मेरी प्यारी खिचड़ी का भोग लगाओ।'

जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी प्रसाद से जुड़ी परंपरा
भगवान अपनी बनाई हुई और भक्त के साथ तय की गई व्यवस्था में किसी भी तरह का बदलाव नहीं करते हैं। एक दिन जब करमाबाई का समय पूरा हो गया और उनके प्राण छूटे, तो उसे दिन जगन्नाथ भगवान काफी रोए। जब पुजारी ने सुबह मंदिर का पट खोला तो देखा कि, विग्रह की आंखों में आंसू बह रहे थे।
पुजानी ने व्याकुल होकर रोने की वजह पूछी तो भगवान बोले- पुजारी जी, आज मेर मां इस नश्वर लोक को छोड़कर परम धाम चली गई। अब मुझे सुबह उठकर रोजाना खिचड़ी कौन खिलाएगा? प्रभु की बात सुनकर पुजारी का दिल भर आया। उन्होंने प्रभु से कहा कि, आपको आपकी माता की कमी महसूस कभी नहीं होगी। आज से इस मंदिर में सबसे पहले रोज सुबह आपको इसी खिचड़ी का मुख्य भोग लगेगा। इस तर माता करमाबाई के जाने के बाद आज भी पुरी में भगवान जगन्नाथ को सुबह सबसे पहले खिचड़ी प्रसाद का पहला भोग लगाया जाता है।
भगवान जगन्नाथ के लिए बनने वाले खिचड़ी भोग में केवल चावल, देसी घी, मूंग दाल और खास मसालों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा खिचड़ी में आलू, टमाटर, फूलगोभी जैसी विदेशी सब्जियां पूरी तरह से वर्जित मानी जाती है।
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भगवान जगन्नाथ के खिचड़ी प्रसाद से जुड़े रोचक तथ्य
मंदिर में चाहे लाखों भक्त ही क्यों न आ जाए, यहां महाप्रसाद कभी भी कम नहीं पड़ता है और न ही बर्बाद होता है। मंदिर के कपाट बंद होते ही प्रसाद भी अपने आप खत्म हो जाता है।
जब यह खिचड़ी मंदिर की रसोई में बनती है, तो पूरे मंदिर परिसर में इसकी खुशबू फैल जाती है, जो श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
जगन्नाथ जी को भोग लगाने के बाद इस खिचड़ी को मां विमला के सामने रखा जाता है, जिसके बाद यह प्रसाद महाप्रसाद बन जाता है।
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