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    जगन्नाथ रथ यात्रा की वो चमत्कारी डोर, जिसे छू लेने भर से क्यों खुद को धन्य मानते हैं लाखों भक्त?

    Updated: Fri, 10 Jul 2026 05:39 PM (IST)

    पुरी में हर साल निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में विशाल रस्सियां श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती हैं, जिन्हें वासुकी या नंदीघोष कहा जाता है। ...और पढ़ें

    जगन्नाथ रथ यात्रा की रस्सी से जुड़ा रहस्य (AI Image)

    जगन्नाथ रथ यात्रा की रस्सी से जुड़ा रहस्य (AI Image)

    HighLights

    1. रथ यात्रा की रस्सी को वासुकी या नंदीघोष कहते हैं।

    2. पवित्र रस्सी छूने से पिछले जन्म के पाप मिटते हैं।

    3. यह रस्सी सामाजिक एकता और जीवन यात्रा दर्शाती है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर वर्ष उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। इस दौरान रथ के आगे विशाल रस्सियां हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ बैरिकेड्स के ऊपर से झुककर उस रस्सी को छूने की प्रतीक्षा करते हैं।

    रथ यात्रा में आए कुछ सौभाग्यशाली श्रद्धालुओं को रस्सी छूने का मौका भी मिल जाता है। कई लोग रस्सी के एकमात्र स्पर्श से भी खुद को धन्य समझ लेते हैं। आइए जानते हैं जगन्नाथ रथ यात्रा की रस्सी से जुड़ा रहस्य।

    जगन्नाथ रथ यात्रा की रस्सी की कहानी

    कई लोगों को जानकार हैरानी हो सकती है कि एक साधारण सी रस्सी जो दिखने में काफी सामान्य और व्यावहारिक लग सकती है, लेकिन इसका सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है, इतनी विशाल आध्यात्मिक श्रद्धा को प्रेरित करना। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली इस रस्सी को वासुकी के नाम से जाना जाता है। इसे नंदीघोष भी कहा जाता है।

    दुनियाभर के अधिकांश मंदिर उत्सवों में जहां भक्त गर्भगृह में देवता के दर्शन के लिए इंतजार करते हैं, वहीं रथ यात्रा की अनोखी परंपरा इससे काफी अलग है। भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ मंदिर से बाहर निकलकर लोगों के बीच घूमते हैं। यही वजह है कि, रथ खींचने के लिए श्रद्धालुओं का जन सैलाब पुरी की सड़कों पर आ जाता है।

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    विशालकाय लकड़ी से बने रथों को कोई एक इंसान नहीं खींचता है, बल्कि हजारों लोग रथ एक साथ चलते हैं, एक होकर रथ का भार उठाते हैं।

    मंदिर से जुड़ी परंपराओं में यह भी बताया गया है कि, पवित्र रस्सी को छूने या खींचने से पिछले जन्म के पापों का निवारण होता है। कहा जाता है कि, ये मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही है और अब त्योहार का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। हालांकि रस्सी का धार्मिक महत्व इससे कहीं ज्यादा है।

    हिंदू दर्शन में इसका मतलब

    यहां जीवन की तुलना एक यात्रा से की जाती है। लोग अनुशासन, इच्छाशक्ति और सबसे बढ़कर, अहंकार त्यागने की भावना से आगे बढ़ते हैं। वासुकी चुपचाप इस विचार को प्रतिबिंबित करते हैं। वे खुद रथ का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, वे सिर्फ भक्तों और देवता के बीच कड़ी बन रहे हैं।

    रथ यात्रा के दौरान सामाजिक भेदभाव मिट जाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों द्वारा एक ही रथ को खींचना मन में आशा की उम्मीद जगाता है। शायद यही वजह है कि, आज भी रथ यात्र के दौरान लोग इतने ही आकर्षित होते हैं।

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