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    आखिर क्यों उतरवाए जाते हैं बच्चे के पहले बाल, 16 संस्कारों में क्यों खास है मुंडन संस्कार?

    Updated: Wed, 10 Jun 2026 01:11 PM (IST)

    हिंदू धर्म में मुंडन या चूड़ाकर्म संस्कार का क्या महत्व है? जानिए मनुस्मृति, अग्नि पुराण और ऋषियों के मतानुसार मुंडन संस्कार के नियम। ...और पढ़ें

    क्यों जरूरी है मुंडन संस्कार? (AI-Generated Image)

    क्यों जरूरी है मुंडन संस्कार? (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. मुंडन संस्कार हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में 8वां संस्कार माना जाता है

    2. यह संस्कार बच्चे की आयु, तेज और बल वृद्धि से जुड़ा माना जाता है

    3. अग्नि पुराण में मुंडन के लिए विशेष महीनों का उल्लेख मिलता है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है। इनमें से आठवां संस्कार मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहलाता है। यह वह अवसर होता है जब बच्चे के जन्म के बाद पहली बार उसके बाल उतारे जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह संस्कार केवल परंपरा नहीं, बल्कि बालक यानी बच्चे के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।

    हिंदू धर्म में मुंडन या चूड़ाकर्म संस्कार को लेकर मनुस्मृति (अध्याय 2, श्लोक 35) में मुंडन संस्कार के नियम बताए गए हैं।

    चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः।
    प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ॥

    इसका अर्थ है- वेदों के विधान और आदेशानुसार, सभी द्विज श्रेणियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के बच्चों का चूड़ाकर्म यानी मुंडन संस्कार धार्मिक नियमों के पालन के साथ पहले वर्ष में या फिर तीसरे वर्ष में अवश्य किया जाना चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मुंडन संस्कार केवल बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह बच्चे के जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। माना जाता है कि इस संस्कार के माध्यम से शिशु को गर्भकाल और जन्म से जुड़े पुराने प्रभावों से मुक्त कर उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है।

    mundan niyam

    (AI-Generated Image)

    यही वजह है कि कई परिवार किसी तीर्थस्थल या कुलदेवता के मंदिर में जाकर मुंडन संस्कार कराते हैं। इस अवसर पर परिवार के सदस्य बच्चे के स्वस्थ, दीर्घायु और सफल जीवन के लिए प्रार्थना भी करते हैं। भारतीय संस्कृति में यह संस्कार बच्चे के शारीरिक विकास के साथ-साथ उसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक माना जाता है।

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    शास्त्रों के अनुसार, यह संस्कार गर्भकाल से जुड़े दोषों की शुद्धि तथा बालक के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और तेज की कामना के लिए किया जाता है। इसी कारण इसे हिंदू जीवन पद्धति (विधि) का एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है।

    सिर पर क्यों बनाई जाती है शिखा?

    धार्मिक मान्यता है कि जन्म के समय वाले बालों को हटाकर बच्चे के जीवन में एक नई शुरुआत का प्रतीक स्थापित किया जाता है। इसी प्रक्रिया में बालक को शिखा (चोटी) धारण कराई जाती है, जिसे ज्ञान, अनुशासन और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना गया है।

    ज्योतिष शास्त्र में मुंडन संस्कार के नियम

    ज्योतिष शास्त्र में भी मुंडन संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व बताया गया है। वैदिक मंत्रोच्चारण और धार्मिक विधि-विधान के साथ किए गए इस संस्कार को अधिक फलदायी माना जाता है। वहीं, अग्नि पुराण में उल्लेख मिलता है कि माघ से लेकर आषाढ़ तक के छह महीने मुंडन संस्कार के लिए शुभ माने गए हैं, जबकि श्रावण (सावन) से आगे के महीनों में इसे करने से बचने की सलाह दी गई है।

    हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मुंडन संस्कार की विधि और समय अलग-अलग हो सकता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य बच्चे के उज्ज्वल, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना करना ही माना गया है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।