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    108 का महा-रहस्य: हिंदू धर्म में इस संख्या को क्यों माना जाता है इतना चमत्कारी?

    Updated: Tue, 09 Jun 2026 04:45 PM (IST)

    हिंदू धर्म में 108 संख्या को बेहद पवित्र माना जाता है। जानिए जप माला, योग, मंत्र जाप, ज्योतिष और आध्यात्मिक साधना में 108 संख्या के महत्व। ...और पढ़ें

    108 संख्या का क्या महत्व है? (AI-Generated Image)

    108 संख्या का क्या महत्व है? (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. 108 आध्यात्मिक पूर्णता का प्रतीक है

    2. जप, ध्यान और योग में इसका विशेष उपयोग होता है

    3. ज्योतिष और संस्कृत भाषा से भी इसका संबंध बताया गया है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनका पालन सदियों से किया जा रहा है। इन्हीं में से एक है 108 संख्या का विशेष महत्व। आपने अक्सर देखा होगा कि जपमाला में 108 मनके होते हैं, मंत्रों का जाप 108 बार किया जाता है और कई धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसी संख्या का उपयोग होता है। आखिर ऐसा क्यों है?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 108 संख्या आध्यात्मिक पूर्णता और ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के 108 नाम बताए गए हैं। माना जाता है कि इन नामों का स्मरण करने से भक्त को विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

    योग और ध्यान की दृष्टि से भी 108 का महत्व बेहद खास है। योग शास्त्र के अनुसार, शरीर में ऊर्जा के 108 प्रमुख मार्ग यानी नाड़ियां होती हैं। ये नाड़ियां हमारे शारीरिक और मानसिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करती हैं। इसी वजह से ध्यान, प्राणायाम और मंत्र जाप में 108 बार दोहराव को शुभ माना गया है।

    क्यों होते हैं जपमाला में भी 108 मनके?

    जपमाला में भी 108 मनके होते हैं। मान्यता है कि एक माला पूरी करने से साधक का मन एकाग्र होता है और वह आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ता है। यही कारण है कि अधिकांश मंत्रों का जाप 108 बार करने की परंपरा है।

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    (AI-Generated Image)

    ज्योतिष में भी इस संख्या का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियां और 9 ग्रह माने गए हैं। जब 12 और 9 का गुणा किया जाता है तो परिणाम 108 आता है। इसी वजह से इसे ब्रह्मांड और मानव जीवन के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध का प्रतीक माना जाता है।

    संस्कृत भाषा से भी गहरा नाता

    संस्कृत भाषा में भी 108 संख्या का संबंध बताया जाता है। कहा जाता है कि संस्कृत के 54 मूल अक्षर हैं और प्रत्येक अक्षर का स्त्री तथा पुरुष स्वरूप माना गया है। इस प्रकार 54 गुणा 2 करने पर संख्या 108 प्राप्त होती है।

    धार्मिक और योगिक परंपराओं में 108 केवल एक संख्या नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरूकता, आत्मशुद्धि और ईश्वर से जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है। यही वजह है कि आज भी पूजा-पाठ, योग और ध्यान में इसका विशेष महत्व बना हुआ है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।