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    महाभारत युद्ध में बलराम की अनुपस्थिति का रहस्य: जब श्रीकृष्ण युद्ध में थे, तब कहां थे उनके बड़े भाई?

    Updated: Thu, 16 Jul 2026 01:00 PM (IST)

    महाभारत युद्ध में बलराम ने हिस्सा नहीं लिया क्योंकि वे भाइयों के बीच युद्ध नहीं देखना चाहते थे और दोनों पक्षों से समान प्रेम करते थे। ...और पढ़ें

    भीम और दुर्योधन दोनों ही बलराम को अपना गुरु मानते थे।  (Picture Credit- AI Generated)

    भीम और दुर्योधन दोनों ही बलराम को अपना गुरु मानते थे। (Picture Credit- AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण ने खुद ही कहा है, 'युद्ध वही अच्छा होता है, जो कभी लड़ा ही न जाए।' श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम भी इस बात से पूरी तरह इत्तेफाक रखते थे। यही वजह थी, 18 दिन तक चले महाभारत के युद्ध में बलराम कहीं भी उपस्थित नहीं थे।

    लोगों के मन में यह भी प्रश्न उठता है कि इतना बलशाली योद्धा अगर महाभारत के युद्ध में हिस्सा ले लेता, यह युद्ध केवल दो दिन में ही समाप्त हो जाता क्योंकि महाबली बलराम जिस पक्ष के भी साथ होते उसे हार का भय न होता। लेकिन बलराम महाभारत युद्ध में अगर हिस्सा ले रहे होते, तो वह किसके पक्ष में होते? यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

    तो चलिए जानते हैं कि महाभारत युद्ध के वक्त बलराम आखिर कहां थे और उन्होंने क्यों इस युद्ध का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। आखिर बलराम किसकी जीत चाहते थे?

    क्‍यों नहीं लिया बलराम ने महाभारत युद्ध में हिस्‍सा ?

    महाभारत के शल्‍य पर्व के आरंभिक अध्‍यायों में इस बात का जिक्र मिलता है कि बलराम कभी भी इस युद्ध के लिए तैयार नहीं थे। भाई-भाई में युद्ध वो अपनी आंखों से नहीं देखना चाहते थे। उनको कौरवों और पांडवों, दोनों से ही समान प्रेम था। यही कारण था कि उन्‍होंने इस युद्ध में न शामिल होने का फैसला लिया।

    महाभारत युद्ध के वक्‍त कहां थे बलराम?

    बलराम बहुत ज्‍यादा धर्मसंकट में थे कि वो किसका पक्ष लें। कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध हो, ऐसा वो कभी नहीं चाहते हैं। इन परिस्थितियों में उनका मन विचलित हो रहा था। इस‍लिए युद्ध आरंभ होने से पहले ही बलराम सरस्वती नदी के किनारों पर मौजूद तीर्थों की यात्रा पर निकल गए।। इस दौरान बलराम ने कई तीर्थों का भ्रमण किया और युद्ध रुक जाए इस कामना से खूब दान-पुण्‍य भी किया।

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    महाभारत युद्ध में किसकी जीत चाहते थे बलराम?

    बलराम कुश्ती और गदा युद्ध में माहिर थे। भीम और दुर्योधन दोनों ही बलराम को अपना गुरु मानते थे। अपने दोनों शिष्यों को बलराम बहुत प्रेम और सम्मान देते थे। दोनों में से किसी एक की विजय और एक की ही हार के लिए वह कभी सोच भी नहीं सकते थे।

    अतः इन्हीं सारे कारणों से बलराम ने पहले ही श्री कृष्ण को कह दिया था कि वह इस युद्ध का हिस्सा कभी नहीं बनेंगे और यही कामना करेंगे युद्ध न हो। वहीं दूसरी तरफ भगवान श्री कृष्ण युद्ध के पक्ष में थे क्योंकि यह युद्ध धर्म स्थापना के लिए लड़ा जा रहा था।

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