गणेश जी ने सरस्वती नदी को क्यों दिया विलुप्त होने का श्राप, क्या है महाभारत की इस घटना का रहस्य?
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश ने सरस्वती नदी को विलुप्त होने का श्राप दिया था। यह घटना महाभारत के लेखन के दौरान हुई जब नदी के तेज शोर से गणेश जी क ...और पढ़ें

सरस्वती नदी से जुड़ा रहस्य (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में सरस्वती नदी को अत्यंत पवित्र माना गया है। इस नदी को जीवनदायिनी के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सरस्वती नदी का ध्यान करने से साधक को आध्यात्मिक शांति मिलती है। इस नदी के जल को पूर्वजों के तर्पण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।
महाभारत, ऋग्वेद और कई पुराणों में इस नदी का वर्णन देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इसी नदी के तट पर बैठकर ऋषि-मुनियों ने वेदों के मंत्रों की रचना की थी।

(AI Generated Image)
पौराणिक कथा के अनुसार, इस नदी के लुप्त होने का भगवान गणेश ने श्राप दिया था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों भगवान गणेश ने सरस्वती नदी को श्राप दिया था। अगर नहीं पता, तो आइए आपको बताते हैं इससे जुड़ी खास वजह के बारे में।
महर्षि वेदव्यास जी गणेश जी को सुनाई महाभारत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ के पास माणा गांव स्थित है। यहां पर सरस्वती नदी के किनारे महर्षि वेदव्यास जी महाभारत की कथा भगवान गणेश को सुना रहे थे और गणपति बप्पा उस कथा को लिख रहे थे। इस दौरान सरस्वती नदी तेज धारा में बह रही थी, जिससे अधिक शोर हो रहा था। शोर होने के कारण गणेश जी को कथा सही से सुनाई नहीं दे रही थी।
यह भी पढ़ें- राजा पांडु की मृत्यु का कारण बना था एक 'श्राप', जानिए क्यों अपनी ही पत्नी को छूना पड़ा उन्हें भारी
भगवान गणेश ने सरस्वती नदी को दिया ये श्राप
ऐसे में महर्षि वेदव्यास और भगवान गणेश ने सरस्वती नदी से अपना वेग कम करने की प्रार्थना की, जिससे भगवान गणेश को कथा सुनाई दे और कथा को लिखने में कोई विघ्न न आए, लेकिन उनकी बात को सरस्वती नदी ने नहीं माना।
खबरें और भी
इससे भगवान गणेश को क्रोध आया और सरस्वती नदी को श्राप दिया और कहा कि अब से इसी जगह के आगे से तुम लुप्त हो जाओगी और पाताल लोक से होकर बहोगी। उनके इसी श्राप की वजह से माणा गांव में सरस्वती नदी कुछ दूर बहने के बाद आगे जमीन में विलुप्त हो जाती है।
त्रिवेणी संगम का अटूट हिस्सा- प्रयागराज में यमुना, गंगा और सरस्वती का मिलन होता है, जिसे त्रिवेणी संगम कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जहां गंगा और यमुना दिखाई देती हैं, लेकिन सरस्वती नदी यहां पर अदृश्य रूप में आकर इन दोनों नदियों में मिलती है।
यह भी पढ़ें- देवव्रत से भीष्म तक का सफर: राजकुमार जिसने एक प्रतिज्ञा के लिए दांव पर लगा दिया अपना पूरा जीवन
यह भी पढ़ें- महाभारत का वो योद्धा, जो सिर्फ 3 बाणों से खत्म कर सकता था युद्ध; पढ़ें कृष्ण ने क्यों मांगा उसका शीश?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।